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डॉक नहीं पहुंचने पर चयन से बाहर नहीं कर सकते:हाईकोर्ट ने कहा समय पर आवेदन, उम्मीदवार को मौका बनता हैप्रयागराज39 मिनट पहले
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई अभ्यर्थी समय सीमा के भीतर ऑनलाइन आवेदन करने के साथ विज्ञापन में निर्धारित अवधि के अंदर आवेदन की हार्ड कॉपी भी भेज देता है, तो डाक से दस्तावेज पहुंचने में देरी के आधार पर उसे चयन प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि अभ्यर्थी की ओर से लापरवाही नहीं होने पर डाक विभाग की देरी का खामियाजा उसे नहीं भुगतना चाहिए। जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा कि डाक से जुड़ी ऐसी अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण अभ्यर्थी की उम्मीदवारी समाप्त करना एक प्रक्रियागत शर्त को उसके मूल अधिकार से वंचित करने का जरिया बनाने जैसा होगा। यह कथित चूक की प्रकृति के अनुपात में भी नहीं होगा।
क्या है मामला जानिये
मामले के अनुसार, चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत पदों पर भर्ती के लिए 18 अगस्त 2026 को विज्ञापन जारी किया गया। इन पदों पर चयन केवल साक्षात्कार के माध्यम से होना था। ऑनलाइन आवेदन और शुल्क जमा करने की अंतिम तारीख 1 सितंबर 2026 थी, जबकि आवेदन पत्र की हार्ड कॉपी आवश्यक दस्तावेजों के साथ 15 सितंबर 2026 को शाम पांच बजे तक आयोग के कार्यालय पहुंचनी थी। विज्ञापन में हार्ड कॉपी भेजने के लिए रजिस्टर्ड डाक, स्पीड पोस्ट या व्यक्तिगत रूप से जमा करने की अनुमति दी गई।
प्वाइंट टू प्वाइंट बताया
याचिकाकर्ता अनुराधा ने 31 अगस्त 2026 को ऑनलाइन आवेदन करने के साथ शुल्क भी जमा कर दिया। इसके बाद उसने 8 सितंबर 2026 को रजिस्टर्ड डाक से आवेदन पत्र की हार्ड कॉपी भेजी। हालांकि, यह दस्तावेज निर्धारित अंतिम तारीख के एक दिन बाद, 16 सितंबर को आयोग के इलाहाबाद स्थित कार्यालय पहुंचा। आयोग ने इसे स्वीकार करने से इनकार किया और लिफाफे पर इस संबंध में टिप्पणी दर्ज कर दी। आवेदन 21 सितंबर को याचिकाकर्ता को वापस मिला। याचिकाकर्ता को डाक विभाग से जानकारी मिली कि 18वें ब्रिक्स नेताओं के शिखर सम्मेलन के कारण दिल्ली और नई दिल्ली के कार्यालय 11 से 13 सितंबर 2026 तक बंद रहे थे। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 30 सितंबर को आयोग के समक्ष अभ्यावेदन देकर अपनी स्थिति स्पष्ट की, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला।
आयोग ने दी दलील
आयोग की ओर से दलील दी गई कि अंतिम तारीख के बाद प्राप्त हार्ड कॉपी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने डाक की ट्रैकिंग रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने आवेदन निर्धारित समय के भीतर भेज दिया था और उसके बाद डाक के माध्यम से दस्तावेज पहुंचने की प्रक्रिया पूरी हुई। रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं था, जिससे यह साबित हो कि अभ्यर्थी ने अपनी ओर से कोई लापरवाही की थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अवलोकन
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आशुतोष अग्निहोत्री बनाम मध्य प्रदेश हाईकोर्ट एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस मामले में भी अभ्यर्थी ने स्पीड पोस्ट से आवेदन समय पर भेजा था, लेकिन वह अंतिम तारीख के एक दिन बाद संबंधित हाईकोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने देरी के आधार पर आवेदन खारिज किए जाने के फैसले को निरस्त करते हुए अभ्यर्थी को इसके लिए जिम्मेदार नहीं माना था। हाईकोर्ट ने कहा कि यही सिद्धांत सदफ इमरान बनाम उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग मामले में भी अपनाया गया। इसके अलावा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऋषिश प्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, इलाहाबाद मामले में भी माना था कि भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित माध्यम से समय पर आवेदन भेजने वाले अभ्यर्थी को डाक विभाग की देरी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने कहा कि जब समय पर आवेदन भेजने और अभ्यर्थी की ओर से लापरवाही नहीं होने की पुष्टि हो जाती है, तो डाक पहुंचने में बाद में हुई देरी अपने आप चयन प्रक्रिया से बाहर करने का वैध आधार नहीं बन सकती।
उम्मीदवारी पर विचार किया जाए
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जब भर्ती प्राधिकरण स्वयं रजिस्टर्ड डाक और स्पीड पोस्ट के माध्यम से आवेदन भेजने की अनुमति देता है तो वह उसी व्यवस्था से जुड़ी देरी के परिणामों से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता। ऐसा करना एक सतर्क और नियमों का पालन करने वाले अभ्यर्थी को चयन से बाहर करने जैसा होगा। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि आयोग ने डाक से आवेदन पहुंचने में मामूली देरी के आधार पर हार्ड कॉपी लौटाकर गलती की। अदालत ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, इलाहाबाद को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता 16 अक्टूबर 2026 को शाम पांच बजे तक हार्ड कॉपी प्रस्तुत करता है, तो उसे स्वीकार कर रिकॉर्ड पर लिया जाए। इसके बाद विज्ञापन की शर्तों और लागू नियमों के अनुसार उसकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाए।
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