मूवी रिव्यू – ‘मैं वापस आऊंगा’:प्यार, बंटवारा और 78 साल का इंतजार… इम्तियाज अली की फिल्म इमोशनल करती है, मगर कुछ सवाल भी छोड़ जाती है

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मूवी रिव्यू – ‘मैं वापस आऊंगा’:प्यार, बंटवारा और 78 साल का इंतजार… इम्तियाज अली की फिल्म इमोशनल करती है, मगर कुछ सवाल भी छोड़ जाती है3 घंटे पहलेलेखक: आशीष तिवारी

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इम्तियाज अली द्वारा निर्देशित फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' 12 जून 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। - Dainik Bhaskarइम्तियाज अली द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ 12 जून 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है।

इम्तियाज अली जब भी फिल्म बनाते हैं तो कहानी सिर्फ कहानी नहीं रहती, एक एहसास बन जाती है। ‘मैं वापस आऊंगा’ भी उसी तरह की फिल्म है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उनकी प्रेम कहानी किसी पहाड़, शहर या सफर के बीच नहीं, बल्कि भारत पाकिस्तान बंटवारे की त्रासदी के बीच जन्म लेती है।

यह फिल्म प्रेम की बात करती है, लेकिन सिर्फ प्रेम की नहीं। यह उन यादों की भी बात करती है जो उम्र के आखिरी पड़ाव तक इंसान का पीछा नहीं छोड़तीं। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने अपना घर खोया, अपना शहर खोया और कई मामलों में अपना प्यार भी खो दिया।

फिल्म की कहानी फिल्म की शुरुआत 95 साल के ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह) से होती है। उम्र और बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया है, लेकिन एक जिद अब भी बाकी है। वह पाकिस्तान के सरगोधा वापस जाना चाहते हैं। उनके पोते निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) को समझ नहीं आता कि आखिर दादा बार बार उसी जगह लौटने की बात क्यों करते हैं।

धीरे धीरे कहानी अतीत की तरफ जाती है और सामने आती है ईशर और जिया की प्रेम कहानी। युवा ईशर के किरदार में वेदांग रैना हैं और जिया के रोल में शरवरी। दोनों की दुनिया में प्रेम है, सपने हैं और साथ जीने की उम्मीद है। फिर बंटवारा होता है और सब कुछ बदल जाता है।

फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बंटवारे को राजनीतिक घटना की तरह नहीं, बल्कि आम लोगों के दर्द की तरह दिखाती है। हालांकि पहला हिस्सा कहानी को स्थापित करने में थोड़ा ज्यादा समय लेता है। कई बार लगता है कि फिल्म अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए जरूरत से ज्यादा घूम रही है। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी भावनात्मक तौर पर मजबूत होती जाती है और अंत तक आते आते असर छोड़ती है।

फिल्म में एक्टिंग अगर इस फिल्म का सबसे मजबूत स्तंभ चुनना हो तो वह नसीरुद्दीन शाह हैं। उन्होंने ईशर सिंह के किरदार को निभाया नहीं, जिया है। भूलती हुई यादें, अधूरी बातें, खोया हुआ प्यार और आखिरी बार अतीत को छू लेने की बेचैनी, सब कुछ उनके चेहरे पर दिखाई देता है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां बिना संवाद बोले भी वह दर्शकों को भावुक कर देते हैं।

वेदांग रैना ने भी शानदार काम किया है। उनके भीतर एक सच्चाई दिखाई देती है जो किरदार को विश्वसनीय बनाती है। यह उनके करियर की अब तक की सबसे मजबूत परफॉर्मेंस में गिनी जा सकती है। शरवरी स्क्रीन पर आते ही ध्यान खींचती हैं। उनके किरदार में मासूमियत भी है और भावनात्मक गहराई भी। इम्तियाज अली की फिल्मों की नायिकाओं में जो एक अलग तरह की गर्माहट होती है, वह जिया के किरदार में भी दिखाई देती है।

दिलजीत दोसांझ अपने किरदार में सहज हैं, लेकिन सच यह है कि फिल्म का सबसे भावुक और प्रभावशाली हिस्सा नसीरुद्दीन शाह और वेदांग रैना के हिस्से में जाता है। दिलजीत की कहानी जरूरी है, मगर उतनी यादगार नहीं बन पाती। फिल्म में डायरेक्शन इम्तियाज अली की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से भावनाओं को पकड़ना रही है और यहां भी वही दिखाई देता है। वह बंटवारे को आंकड़ों या इतिहास की किताबों की तरह नहीं दिखाते। वह दिखाते हैं कि उस दौर में बिछड़ना कैसा लगता होगा। किसी अपने का अचानक छूट जाना कैसा लगता होगा।

फिल्म का दूसरा हिस्सा इम्तियाज की पकड़ को साबित करता है। कई दृश्य लंबे समय तक याद रहते हैं। खासकर वे सीन जहां प्रेम और बिछड़न एक साथ दिखाई देते हैं। हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी यहीं है। लगभग तीन घंटे की अवधि हर दर्शक के लिए आसान नहीं होगी। पहले हिस्से में कई सीन ऐसे हैं जिन्हें छोटा किया जा सकता था। फिल्म कई बार जरूरत से ज्यादा ठहर जाती है।

फिल्म का तकनीकी पहलू फिल्म देखने में बेहद खूबसूरत लगती है। सिनेमेटोग्राफी फिल्म का बड़ा प्लस पॉइंट है। सरगोधा की गलियां, पुराने घर, खेत और उस दौर का माहौल स्क्रीन पर बहुत प्रभावी तरीके से उभरकर आता है।

प्रोडक्शन डिजाइन पर भी मेहनत दिखाई देती है। फिल्म अपने समय और माहौल को विश्वसनीय बनाने में सफल रहती है। एडिटिंग थोड़ी और कसी हुई होती तो फिल्म का असर और ज्यादा बढ़ सकता था। फिल्म में म्जूजिक इम्तियाज अली और ए आर रहमान की जोड़ी से हमेशा उम्मीदें रहती हैं। इस फिल्म में भी संगीत कहानी का हिस्सा बनकर आता है। बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों को भावनात्मक ऊंचाई देता है।

कुछ गाने सुनने के बाद भी याद रहते हैं, लेकिन एल्बम उस लेवल तक नहीं पहुंचता जहां रहमान के पुराने और यादगार काम पहुंचते रहे हैं। फिर भी फिल्म के मूड के हिसाब से संगीत पूरी तरह फिट बैठता है।

फिल्म में कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी लंबाई है। करीब तीन घंटे की यह फिल्म कई जगह अपनी रफ्तार खो देती है। पहले हिस्से में धैर्य रखना पड़ता है। कुछ सब प्लॉट भी पूरी तरह प्रभाव नहीं छोड़ पाते। कई दर्शकों को यह भी लग सकता है कि फिल्म अपने भावनात्मक असर तक पहुंचने में जरूरत से ज्यादा समय लेती है।

फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘मैं वापस आऊंगा’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है जो आपको सीट से बांधे रखे और हर दस मिनट में चौंकाए। यह धीरे धीरे खुलने वाली फिल्म है। इसके कुछ हिस्से बेहद खूबसूरत हैं, कुछ हिस्से थोड़े लंबे हैं, लेकिन जब फिल्म अपने भावनात्मक शिखर पर पहुंचती है तो असर छोड़ती है।

नसीरुद्दीन शाह का शानदार अभिनय, वेदांग रैना और शरवरी की सादगी भरी केमिस्ट्री, इम्तियाज अली का संवेदनशील निर्देशन और ए आर रहमान का संगीत फिल्म को खास बनाते हैं।

अगर आपको भावनात्मक कहानियां पसंद हैं और आप धीमी रफ्तार वाली फिल्मों से परहेज नहीं करते, तो ‘मैं वापस आऊंगा’ आपके लिए एक संतोषजनक सिनेमाई अनुभव साबित हो सकती है।

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