गैंगरेप के 47 साल बाद फ़ैसला बरकरार:हाईकोर्ट ने 71 साल के व्यक्ति की जेल की सज़ा कम की

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गैंगरेप के 47 साल बाद फ़ैसला बरकरार:हाईकोर्ट ने 71 साल के व्यक्ति की जेल की सज़ा कम कीप्रयागराज2 मिनट पहले

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को 1979 के नाबालिग के साथ गैंग-रेप के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराए जाने का फ़ैसला बरकरार रखा, लेकिन उसकी मुख्य सज़ा को 7.5 साल से घटाकर 4 साल की कठोर कारावास कर दिया। जस्टिस संतोष राय की बेंच ने आपराधिक अपील के 43 स

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इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी-अपीलकर्ता द्वारा दायर आपराधिक अपील को आंशिक रूप से मंज़ूरी दे दी। उसे सरेंडर करने और बाकी बची सज़ा काटने का निर्देश दिया गया।

1979 का गंभीर मामला

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 31 अक्टूबर और 1 नवंबर 1979 की रात को नाबालिग पीड़िता (उम्र 15 से 17 साल के बीच) का गाँव के ही तीन लोगों – काली चरण, राम लाल और राम स्वरूप (हाईकोर्ट में अपीलकर्ता) – ने चाकू की नोक पर ज़बरदस्ती अपहरण कर लिया। उसे ट्रेन से शाहजहाँपुर होते हुए तिलहर के एक खाली घर में ले जाया गया, जहाँ उसे एक हफ़्ते तक बंधक बनाकर रखा गया और बार-बार गैंग-रेप किया गया। इसके बाद उसे एक मेला दिखाने के लिए बिल्संडा लाया गया, जहां 31 अक्टूबर और 1 नवंबर 1979 की रात को एक सब-इंस्पेक्टर ने उसे बचाया। इसके बाद तीनों आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की गई।

1983 में पीलीभीत की असिस्टेंट सेशंस जज दोषी पाया

1983 में पीलीभीत की असिस्टेंट सेशंस जज की कोर्ट ने तीनों को दोषी पाया और उन्हें अधिकतम साढ़े सात साल की सज़ा सुनाई। दोषियों ने 1983 में हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दी। अपील लंबित रहने के दौरान, सह-अपीलकर्ता काली चरण और राम लाल की मौत हो गई और 2022 में उनके मामले में अपील खत्म हो गई। यह मामला सिर्फ अपीलकर्ता राम स्वरूप के लिए बचा रहा, जो ट्रायल के समय 27 साल के थे और अब 71 साल के हैं।

हाईकोर्ट के सामने अपीलकर्ता कालीचरण के वकील ने दोषसिद्धि के सवाल पर अपील को आगे नहीं बढ़ाया और अपनी बात सिर्फ़ सज़ा के सवाल तक सीमित रखी। यह दलील दी गई कि यह एक ऐसा मामला है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा को इस कोर्ट के विवेक का इस्तेमाल करते हुए उचित रूप से कम किया जा सकता है, जबकि दोषसिद्धि को बरकरार रखा जाए और अपीलकर्ता को प्रोबेशन पर रिहा किया जाए।

सज़ा देना केवल बदला लेने की प्रक्रिया नहीं

हालांकि, जस्टिस राय ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा “ऐसे मामलों में, जहां पीड़ित की गवाही दोषसिद्धि का आधार होती है, दोषी के प्रति ‘अत्यधिक सहानुभूति’ दिखाना न्याय का घोर उल्लंघन होगा।

सज़ा देना केवल बदला लेने की प्रक्रिया नहीं है; इसका मकसद अपराधी और दूसरों के लिए एक सबक होना चाहिए, और कमज़ोर लोगों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने वालों की मंशा को भी दिखाना चाहिए”।

अपराध को ‘जघन्य’ बताते हुए बेंच ने कहा कि यौन हिंसा का सामाजिक असर बहुत गहरा होता है। इतने गंभीर मामले में प्रोबेशन का लाभ देना सामाजिक हित और आपराधिक न्याय के सिद्धांतों के “विपरीत” होगा।

अपील 43 साल से लंबित रही

हालांकि, बेंच ने गौर किया कि आई पी सी की धारा 376, जो उस समय लागू थी, अदालतों को “पर्याप्त और विशेष कारणों” से सज़ा को कानून में तय सात साल की न्यूनतम अवधि से कम करने की इजाज़त देती थी। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि घटना 1979 की, यानी लगभग 47 साल पुरानी है और अपील खुद इस कोर्ट में लगभग 43 साल से लंबित रही है, जिसमें अपीलकर्ता की कोई गलती नहीं थी। बेंच ने यह भी गौर किया कि अपीलकर्ता, जो ट्रायल के समय लगभग 27 साल का था, अभी लगभग 71 साल का है, और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे पता चले कि वह इस घटना से पहले या बाद में किसी अन्य आपराधिक मामले में शामिल रहा हो। इन हालात के कुल असर को देखते हुए और इस बात से संतुष्ट होकर कि ये आई पी सी की धारा 376(1) के प्रावधान के तहत ‘पर्याप्त और विशेष कारण’ हैं, बेंच ने कहा कि भले ही दोषी ठहराने का फ़ैसला बरकरार रखा जाए, लेकिन मुख्य सज़ा को कम किया जाना चाहिए।

उनकी सज़ा को 7.5 साल की कठोर कैद से घटाकर 4 साल की कठोर कैद (और आई पी सी की धारा 363 और 366 के तहत साथ-साथ चलने वाली दो साल की सज़ा) करते हुए बेंच ने 1983 की ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई एक अहम गलती की ओर इशारा किया। बेंच ने गौर किया कि पीलीभीत ट्रायल कोर्ट आई पी सी की धारा 363, 366 और 376 के तहत जेल की सज़ा के साथ अनिवार्य जुर्माना लगाने में नाकाम रही थी। हालांकि, जस्टिस राय ने साफ़ किया कि चूंकि राज्य या पीड़ित ने सज़ा बढ़ाने के लिए अपील नहीं की थी, इसलिए हाईकोर्ट आरोपी के नुकसान के लिए उस गलती को ठीक नहीं कर सकता था। इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से मंज़ूर की।

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