हिट फिल्म के बाद भी 15 महीने बेरोजगार रहीं कृति:स्टारकिड्स ने छीने बड़े रोल, जिस किरदार पर सवाल उठे, उसी ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड

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हिट फिल्म के बाद भी 15 महीने बेरोजगार रहीं कृति:स्टारकिड्स ने छीने बड़े रोल, जिस किरदार पर सवाल उठे, उसी ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड21 घंटे पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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कृति मानती हैं कि अगर उन्हें शुरुआत में इतनी असफलताएं और रिजेक्शन नहीं मिले होते, तो शायद वह इतनी मजबूत नहीं बन पातीं। - Dainik Bhaskarकृति मानती हैं कि अगर उन्हें शुरुआत में इतनी असफलताएं और रिजेक्शन नहीं मिले होते, तो शायद वह इतनी मजबूत नहीं बन पातीं।QuoteImage

पहले रैंप शो के बाद मैं ऑटो में बैठकर पूरे रास्ते रोती रही थी… पहले फोटोशूट के बाद भी घर जाकर रोई थी। हिट फिल्म के बाद भी 15 महीने काम नहीं मिला। कई बार ऐसा हुआ कि जिस फिल्म के लिए ऑडिशन दिया, आखिर में वह किसी स्टार किड को मिल गई। कई-कई महीने तक कोई ऑडिशन नहीं आता था। मैं मां को दिन में दस-दस बार फोन करके रोती थी।

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आज कृति सेनन बॉलीवुड की सफल अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। उनके नाम नेशनल अवॉर्ड, कई सुपरहिट फिल्में और अपना प्रोडक्शन हाउस है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता रिजेक्शन, अकेलेपन, तानों और आत्मविश्वास की लड़ाई से होकर गुजरा है।

यह कहानी उस लड़की की है, जिसने कभी एक्टिंग का सपना नहीं देखा था, लेकिन रास्ता चुना तो पीछे मुड़कर नहीं देखा।

आज की सक्सेस स्टोरी में कृति सेनन के करियर और निजी जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।

कृति सेनन ने हर मुश्किल का सामना किया, लेकिन सपने से समझौता नहीं किया।कृति सेनन ने हर मुश्किल का सामना किया, लेकिन सपने से समझौता नहीं किया।

दिल्ली की इंजीनियरिंग स्टूडेंट, जिसने सपनों के दम पर बॉलीवुड तक का सफर तय किया

कृति सेनन का जन्म 27 जुलाई 1990 को नई दिल्ली में हुआ। उनके पिता राहुल सेनन चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जबकि मां गीता सेनन दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर रह चुकी हैं। उनकी छोटी बहन नूपुर सेनन भी अभिनय और सिंगिंग की दुनिया में सक्रिय हैं।

कृति ने शुरुआती पढ़ाई दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस), आर.के. पुरम से की। इसके बाद जेपी इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, नोएडा से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री हासिल की।

‘मैं पढ़ाई में अच्छी थी, फिल्मों में आने का कभी नहीं सोचा’

कृति सेनन ने बॉलीवुड बबल को दिए इंटरव्यू में बताया था कि बचपन में उनका पूरा ध्यान पढ़ाई पर रहता था। वह पढ़ाई में अच्छी थीं, लेकिन बेहद शर्मीली भी थीं। वह कहती हैं,”मुझे स्टेज पर जाने से भी डर लगता था। डांस करना पसंद था, लेकिन एक्टिंग, थिएटर या ड्रामा में मैंने कभी हिस्सा नहीं लिया। फिल्मों में आने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था।”

स्कूल के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हुई। जिंदगी तय रास्ते पर चल रही थी। किसी को अंदाजा नहीं था कि यही लड़की आगे चलकर बॉलीवुड की बड़ी स्टार बनेगी।

बी.टेक के दौरान एक सलाह ने बदल दी जिंदगी

इंजीनियरिंग के दौरान एक दिन किसी ने कृति से कहा, “तुम्हारी हाइट अच्छी है, मॉडलिंग क्यों नहीं ट्राय करती?”

पहली प्रतिक्रिया थी- “नहीं… ये मेरे बस की बात नहीं।” लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि कोशिश करने में नुकसान नहीं है। अगर कुछ नहीं हुआ, तो कम से कम कॉन्फिडेंस बढ़ जाएगा। यही फैसला उनकी जिंदगी का बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया।

बहन ने खींचीं तस्वीरें… और किस्मत ने नया दरवाजा खोल दिया

कृति के पास प्रोफेशनल पोर्टफोलियो नहीं था। उनकी छोटी बहन नूपुर ने घर पर ही कुछ तस्वीरें खींचीं।

आज उन तस्वीरों को देखकर कृति खुद हंस पड़ती हैं। वह कहती हैं, “आज भी जब वो तस्वीरें देखती हूं तो हंसी आती है कि कितनी अजीब थीं।”

उन्होंने वही तस्वीरें एक वेबसाइट पर चल रहे फ्रेश फेस कॉन्टेस्ट में भेज दीं। इनाम था- मशहूर फोटोग्राफर डब्बू रत्नानी से मुफ्त पोर्टफोलियो शूट। कृति को सिर्फ इतना पता था कि डब्बू रत्नानी से फोटोशूट महंगा होता है। फैशन और मॉडलिंग की दुनिया के बारे में उन्हें कुछ भी नहीं मालूम था।

किस्मत ने साथ दिया…वह कॉन्टेस्ट जीत गईं। यहीं से मॉडलिंग का पहला कॉन्ट्रैक्ट मिला और फिल्मों तक जाने वाली राह खुली।

पहला फोटोशूट… और घर जाकर फूट-फूटकर रोईं

किसी नए इंसान के लिए कैमरे के सामने खड़ा होना आसान नहीं होता। कृति के लिए भी नहीं था। उन्हें नहीं पता था कि कैमरे की तरफ कैसे देखना है, हाथ कहां रखने हैं और एक्सप्रेशन कैसे देने हैं।

शूट के दौरान फोटोग्राफर ने मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना कहा,”ये तुम्हारा पहला फोटोशूट है ना?”

बात सामान्य थी, लेकिन कृति को लगा कि शायद वह खराब काम कर रही हैं। शूट खत्म हुआ… वह सीधे घर पहुंचीं और रो पड़ीं।

आज भी कृति मानती हैं कि अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने 100 प्रतिशत नहीं दिया, तो यह बात उन्हें लंबे समय तक परेशान करती है।

पहले रैंप शो में सबके सामने डांट पड़ी… ऑटो में बैठकर रोती रहीं

अगर फोटोशूट मुश्किल था, तो पहला रैंप शो उससे भी कठिन साबित हुआ। नर्वसनेस के कारण रैंप पर कोरियोग्राफी में गलती हो गई। शो खत्म हुआ तो कोरियोग्राफर ने करीब 50 मॉडल्स के सामने उन्हें डांट दिया।

कृति कुछ नहीं बोलीं। चुपचाप बाहर निकलीं…एक ऑटो में बैठीं…और पूरे रास्ते रोती रहीं। घर पहुंचकर भी काफी देर तक उनके आंसू नहीं रुके।

मां ने उन्हें समझाते हुए कहा, “मुझे नहीं लगता कि यह दुनिया तुम्हारे लिए बनी है। यहां टिकना है तो बहुत मजबूत बनना पड़ेगा। लोगों की बातें सुनकर टूटोगी तो आगे नहीं बढ़ पाओगी।” शायद यही वह दिन था, जब कृति ने तय किया कि अब रोना बंद… सीखना शुरू।

हार मानना कभी नहीं सीखा

कृति मानती हैं कि उनके अंदर यह आदत हमेशा से रही है। अगर वह गिरती हैं, तो दोबारा उठकर कोशिश करती हैं। वह कहती हैं, “मैं आसानी से हार नहीं मानती। शायद यही वजह है कि हर बार गिरने के बाद मैंने खुद को एक और मौका दिया। धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया।”

यही जिद आगे चलकर उन्हें मॉडल से अभिनेत्री और फिर नेशनल अवॉर्ड विजेता कलाकार बनाने वाली थी।

मुंबई में अकेली रहने लगीं, GMAT की तैयारी भी करती थीं… परिवार ने कहा- पहले सपना पूरा करो

पहले रैंप शो की डांट और शुरुआती असफलताओं के बाद कृति सेनन ने हार नहीं मानी। मॉडलिंग आगे बढ़ रही थी, लेकिन फिल्मों का रास्ता अभी भी धुंधला था। इसी बीच उन्होंने मुंबई आने का फैसला किया। यह आसान नहीं था, क्योंकि वह कभी घर से दूर नहीं रही थीं।

‘मैं कभी हॉस्टल में नहीं रही थी’

कृति बताती हैं, “मैं हमेशा अपने परिवार के साथ रही थी। घर में हर सुविधा थी। कॉलेज तक कार चलाना सीख लिया था, लेकिन कभी अकेले रहने की नौबत नहीं आई थी।”

मुंबई आने के शुरुआती पांच-छह महीने आसान रहे, क्योंकि उस समय उनके पिता की पोस्टिंग भी मुंबई में थी। लेकिन उसके बाद… पापा वापस चले गए और पहली बार कृति पूरी तरह अकेली रह गईं।

किराए का घर… कामवाली… खाना… सारी जिम्मेदारी खुद संभाली

जिंदगी बदल चुकी थी। किराए का घर लेना, खर्च संभालना, खाना बनवाना, कामवाली का इंतजाम करना… हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। इसके साथ ही वह फिल्मों के लिए ऑडिशन दे रही थीं।

इसी दौरान वह GMAT की तैयारी भी कर रही थीं। घरवालों ने उनके लिए प्लान-बी भी तैयार रखा था। अगर एक्टिंग में बात नहीं बनी, तो आगे की पढ़ाई करके दूसरा करियर बनाया जा सकता था। लेकिन कृति के मन में अब सिर्फ एक सपना था।

फिल्म इंडस्ट्री के बारे में कुछ नहीं जानती थीं

मुंबई पहुंचकर उन्हें सबसे ज्यादा अनजान दुनिया ने परेशान किया। कृति कहती हैं, “मुझे समझ ही नहीं आता था कि शुरुआत कहां से करूं। किससे मिलूं, किस प्रोडक्शन हाउस में जाऊं, कौन-सी फिल्म करनी चाहिए और कौन-सी नहीं। मुझे कुछ भी नहीं पता था।”

वह किसी फिल्मी परिवार से नहीं थीं। उनके लिए बॉलीवुड सिर्फ पर्दे की चमक थी। पर्दे के पीछे की दुनिया बिल्कुल नई थी।

‘मैं सिर्फ शाहरुख, माधुरी और ऋतिक की फैन थी’

कृति बताती हैं कि उन्हें फिल्मों से प्यार था। वह माधुरी दीक्षित, शाहरुख खान और ऋतिक रोशन की बड़ी फैन थीं। लेकिन वह मानती हैं कि फैन होना और इंडस्ट्री को समझना अलग बातें हैं। उन्हें यह भी नहीं पता था कि करियर कैसे बनाया जाता है, किससे मिलना चाहिए और कौन सही सलाह देगा।

एजेंसी बनी सबसे बड़ी ताकत

कृति मानती हैं कि शुरुआती दिनों में उनकी मॉडलिंग एजेंसी ने उनका काफी साथ दिया। उन्हें समझाया गया कि कब ऑडिशन देना चाहिए, कब किसी रोल के लिए इंतजार करना चाहिए और कब किसी फिल्म को छोड़ना चाहिए। नए कलाकार के लिए सही सलाह बड़ी ताकत होती है। कृति को यह सहारा मिल गया था।

मां ने कहा- ‘सपनों को मत रोकना’

कृति की सफलता के पीछे उनके माता-पिता का भरोसा सबसे बड़ी ताकत रहा। वह बताती हैं कि उनकी मां अपनी जिंदगी में बहुत कुछ करना चाहती थीं। गाना सीखना… तैरना सीखना… और भी कई सपने… लेकिन उन्हें उतनी आजादी नहीं मिली।

शायद यही वजह थी कि उन्होंने अपनी बेटी से हमेशा कहा,”जो करना चाहती हो, अभी कर लो। सपनों को कभी मत रोकना। वरना बाद में सिर्फ पछतावा रह जाएगा।” यही बात कृति के दिल में बस गई।

पापा का भरोसा नहीं होता, तो शायद यह फैसला कभी नहीं ले पाती

कृति मानती हैं कि परिवार का साथ नहीं होता तो वह शायद कभी फिल्मों में आने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। वह कहती हैं, “अगर उस समय पापा का भरोसा मेरे साथ नहीं होता, तो शायद मैं इतना बड़ा फैसला कभी नहीं ले पाती।” हर स्ट्रगल करने वाले कलाकार को ऐसा परिवार नहीं मिलता। कृति मानती हैं कि यह उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

दोस्त ने कहा- फिल्मों में गई तो शादी नहीं होगी

सपनों के रास्ते में सिर्फ संघर्ष नहीं आया…लोगों की सोच भी सामने आई। कृति बताती हैं कि उनके एक दोस्त ने उनसे कहा था,”अगर तुम मॉडलिंग या फिल्मों में गई, तो बाद में शादी करने में दिक्कत होगी।”

यह सुनकर उन्हें हैरानी हुई। उन्हें लगा कि उनकी ही पीढ़ी के लोग आज भी इतनी पुरानी सोच रखते हैं। लेकिन उन्होंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उनके लिए उस समय शादी नहीं…सपना ज्यादा जरूरी था।

एक बात ने जिंदगी बदल दी

कृति कहती हैं, “मुझे हमेशा लगता था कि अगर मैंने कोशिश ही नहीं की, तो पूरी जिंदगी यही सोचती रहूंगी कि शायद मैं कर सकती थी।” यही सोच उन्हें हर मुश्किल के बाद आगे बढ़ाती रही। उन्हें मंजिल नहीं दिख रही थी…लेकिन भरोसा था कि चलते रहे, तो रास्ता जरूर मिलेगा।

कृति सेनन ने फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ ईयर’ के लिए ऑडिशन दिया था।कृति सेनन ने फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ ईयर’ के लिए ऑडिशन दिया था।

स्टार किड्स ले गए फिल्में, महीनों तक नहीं मिला एक भी ऑडिशन

मुंबई आकर कृति सेनन ने सोचा था कि मेहनत करेंगी और धीरे-धीरे रास्ता बन जाएगा। लेकिन जल्द ही समझ आ गया कि बॉलीवुड में सिर्फ टैलेंट काफी नहीं होता, खासकर तब जब फिल्मी बैकग्राउंड न हो। हर दिन उम्मीद से शुरू होता था…और कई दिन निराशा के साथ खत्म हो जाते थे।

कृति बताती हैं कि कई फिल्मों के लिए उन्होंने ऑडिशन दिए। फिल्म में नए चेहरे की तलाश थी। उन्हें बुलाया गया…उन्होंने तैयारी की…ऑडिशन दिया…उम्मीद भी जगी…लेकिन आखिर में रोल किसी स्टार किड या स्थापित कलाकार को मिल गया।

कृति कहती हैं, “उस समय मन में यही सवाल आता था कि अगर लेना ही नहीं था, तो फिर ऑडिशन क्यों कराया?”

हर बार उम्मीद टूटती थी, लेकिन अगली सुबह फिर नए ऑडिशन की तैयारी शुरू हो जाती थी।

महीने गुजर जाते थे, कोई ऑडिशन नहीं आता था

रिजेक्शन से ज्यादा मुश्किल था… इंतजार। कई-कई महीने गुजर जाते थे, जब कोई ऑडिशन नहीं आता था। फोन नहीं बजता था। कोई कॉल नहीं… कोई मीटिंग नहीं… कोई उम्मीद नहीं… नए कलाकार के लिए यही सबसे कठिन दौर होता है।

कृति कहती हैं कि उस समय लगता था जैसे जिंदगी रुक गई हो, क्योंकि इंडस्ट्री में कोई उन्हें जानता तक नहीं था।

‘मैं मां को दिन में 10-10 बार फोन करती थी’

अकेलापन धीरे-धीरे मानसिक दबाव में बदलने लगा। भविष्य की चिंता… काम न मिलने का डर… और परिवार से दूर रहने के दर्द के बीच उनकी सबसे बड़ी ताकत थीं- उनकी मां।

कृति उस दौर को याद कर इमोशनल हो जाती हैं। वह करती हैं, “मैं मां को दिन में दस-दस बार फोन करती थी। कई बार सिर्फ रोती रहती थी। समझ नहीं आता था कि आगे क्या होगा।” हर बार मां उन्हें एक ही बात कहतीं- “धैर्य रखो… मेहनत करती रहो… सही समय जरूर आएगा।” यही भरोसा उन्हें टूटने नहीं देता था।

आउटसाइडर होना सबसे बड़ी चुनौती था

कृति मानती हैं कि किसी फिल्मी परिवार से न होना अपने आप में संघर्ष है। वह कहती हैं, “आज किसी स्टार किड की पहली फिल्म आती है, तो लोग पहले से उसे जानते हैं। मीडिया में चर्चा होती है। लेकिन जब कोई बिल्कुल नया लड़का या लड़की आता है, तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि उसकी फिल्म कब रिलीज हुई।”

यही वजह थी कि उन्हें हर फिल्म, हर ऑडिशन और हर किरदार के लिए खुद को बार-बार साबित करना पड़ता था।

‘मॉडल्स एक्टिंग नहीं कर सकतीं’

संघर्ष सिर्फ रोल पाने का नहीं था। लोगों ने उन्हें लेकर पहले से राय बना ली थी। कई लोगों का मानना था कि मॉडल सिर्फ दिखने में अच्छी होती हैं, वे अभिनय नहीं कर सकतीं। कृति को अक्सर सिर्फ ‘खूबसूरत चेहरा’ समझा जाता था। उन्हें लगता था कि लोग उनकी मेहनत नहीं, सिर्फ उनका लुक देख रहे हैं।

कृति सेनन ने अभिनय करियर की शुरुआत तेलुगु फिल्म ‘1: नेनोक्कडीने’ से महेश बाबू के साथ की थी। बॉलीवुड डेब्यू ‘हीरोपंती’ से टाइगर श्रॉफ के साथ किया था।कृति सेनन ने अभिनय करियर की शुरुआत तेलुगु फिल्म ‘1: नेनोक्कडीने’ से महेश बाबू के साथ की थी। बॉलीवुड डेब्यू ‘हीरोपंती’ से टाइगर श्रॉफ के साथ किया था।

‘बरेली की बर्फी’ के लिए भी लोगों को भरोसा नहीं था

जब अश्विनी अय्यर तिवारी की फिल्म ‘बरेली की बर्फी’ का ऑफर मिला, तब भी कई लोगों ने सवाल उठाए। लोगों का कहना था कि कृति छोटे शहर की साधारण लड़की का किरदार नहीं निभा पाएंगी। लेकिन कृति ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने किरदार को समझा, उसकी भाषा सीखी, उसका व्यवहार अपनाया।

फिल्म रिलीज हुई, तो वही किरदार उनके करियर का बड़ा मोड़ बन गया। ‘बिट्टी मिश्रा’ के रूप में कृति ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ ग्लैमरस रोल निभाने वाली अभिनेत्री नहीं हैं।

“बरेली की बर्फी के बाद कृति सेनन ने 15 महीने तक कोई फिल्म शूट नहीं किया।

‘पानीपत’ में कहा गया- मराठी लड़की जैसी नहीं लगती

‘बरेली की बर्फी’ के बाद भी सवाल खत्म नहीं हुए। फिल्म ‘पानीपत’ के दौरान लोगों ने कहा- “कृति मराठी लड़की जैसी नहीं लगतीं।” शुरुआत में यह डर खुद कृति के मन में भी था। वह सोचती थीं कि पता नहीं इस किरदार में कैसी लगेंगी। लेकिन जैसे ही उन्होंने कॉस्ट्यूम पहना, मेकअप किया और किरदार में उतरना शुरू किया, सारा डर गायब हो गया।

उन्हें एहसास हुआ कि कलाकार की असली पहचान उसका अभिनय होता है, सिर्फ चेहरा नहीं।

कृति की सबसे बड़ी सीख

लगातार रिजेक्शन, आलोचना और इंतजार ने उन्हें एक बात सिखाई- दूसरों की राय आपकी पहचान तय नहीं कर सकती। उन्होंने हर ‘नहीं’ को अगली ‘हां’ की तैयारी बना लिया। यही सोच आगे चलकर उन्हें उनके करियर की सबसे बड़ी फिल्म तक ले गई।

‘मिमी’ करने से लोगों ने रोका, लेकिन उसी फिल्म ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड

‘बरेली की बर्फी’ के बाद कृति सेनन ने साबित कर दिया था कि वह सिर्फ ग्लैमरस रोल निभाने वाली अभिनेत्री नहीं हैं। फिर भी उन्हें लगता था कि इंडस्ट्री उन्हें पूरी तरह कलाकार के रूप में स्वीकार नहीं कर रही। उन्हें ऐसे किरदारों का इंतजार था, जो उनके अभिनय की असली परीक्षा लें। यह इंतजार फिल्म ‘मिमी’ के साथ खत्म हुआ।

‘इतनी जल्दी मां का रोल मत करो’

जब कृति के पास ‘मिमी’ की स्क्रिप्ट आई, तो कई लोगों ने सलाह दी कि इतनी कम उम्र में मां का किरदार निभाना सही फैसला नहीं होगा। लोगों का मानना था कि इससे उनकी ग्लैमरस इमेज प्रभावित होगी और करियर पर असर पड़ सकता है।

लेकिन कृति ने वही किया, जो हमेशा करती आई थीं। उन्होंने लोगों की नहीं, कहानी की सुनी। कृति कहती हैं, “मेरे लिए सबसे जरूरी कहानी थी। मुझे उस किरदार का सफर बहुत खूबसूरत लगा। अगर कहानी दिल को छू रही है, तो बाकी बातें मायने नहीं रखतीं। मुझे वह फैसला कभी जोखिम नहीं लगा।”

किरदार के लिए बढ़ाया वजन, खुद को पूरी तरह बदल दिया

‘मिमी’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी। यह कृति के करियर की सबसे बड़ी चुनौती थी। सरोगेट मां के किरदार को पर्दे पर सच्चाई के साथ उतारने के लिए उन्होंने वजन बढ़ाया, लुक बदला और किरदार की भावनाओं को समझने में महीनों लगाए।

जब फिल्म रिलीज हुई, तो दर्शकों के साथ समीक्षकों ने भी उनके अभिनय की जमकर तारीफ की। जिस अभिनेत्री को कभी सिर्फ ‘खूबसूरत चेहरा’ कहा जाता था, वही अब अभिनय के लिए सराही जा रही थी।

नेशनल अवॉर्ड ने बदल दी पहचान

‘मिमी’ के लिए कृति सेनन को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री) मिला। यह सिर्फ एक अवॉर्ड नहीं था। यह उन तमाम रिजेक्शन, इंतजार, तानों और संघर्षों का जवाब था, जिनसे वह वर्षों तक गुजरी थीं। जिस लड़की को कभी कहा गया था कि मॉडल एक्टिंग नहीं कर सकती… उसी ने देश का सबसे बड़ा अभिनय सम्मान जीत लिया।

आज भी मानती हैं- रिजेक्शन जरूरी थे

आज जब कृति अपने संघर्ष के दिनों को याद करती हैं, तो उन्हें किसी से शिकायत नहीं होती। वह मानती हैं कि अगर शुरुआत में उन्हें इतनी असफलताएं नहीं मिली होतीं, तो शायद वह इतनी मजबूत कलाकार नहीं बन पातीं।

उनके शब्दों में, “अगर मुझे शुरुआत में इतने रिजेक्शन नहीं मिले होते, तो शायद मैं आज की कृति सेनन नहीं होती। हर रिजेक्शन ने मुझे कुछ नया सिखाया और बेहतर बनने के लिए मजबूर किया।”

हर किरदार के साथ तोड़ा एक नया स्टीरियोटाइप

‘बरेली की बर्फी’ में छोटे शहर की लड़की… ‘पानीपत’ में ऐतिहासिक किरदार… ‘मिमी’ में सरोगेट मां… ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ में रोबोट… और ‘दो पत्ती’ में अभिनेत्री के साथ निर्माता… कृति ने हर बार नया जोखिम उठाया। शायद यही वजह है कि आज उन्हें सिर्फ स्टार नहीं, बल्कि भरोसेमंद अभिनेत्री माना जाता है।

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पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए…

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