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भर्ती परीक्षाओं में ‘जीरो टॉलरेंस’:यूपी में पेपर लीक अब सिर्फ चूक नहीं, बल्कि संगठित अपराध; मास्टरमाइंड की संपत्तियों पर चलेगा बुलडोजरलखनऊ2 मिनट पहले
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प्रतियोगी परीक्षाएं केवल सरकारी नौकरी पाने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे लाखों युवाओं के संघर्ष, परिवारों की उम्मीदों और बेहतर भविष्य के सपनों का आधार होती हैं। एक साधारण परिवार का छात्र वर्षों तक मेहनत करता है, अपनी इच्छाओं को टालता है और इस भरोसे
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जरूरी है युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर कार्रवाई
इसी कड़ी में प्रयागराज में हाल में कुछ कोचिंग संस्थानों पर हुई कार्रवाई ने एक नई बहस को केंद्र में ला खड़ा किया है। आरोप है कि छात्रों की समस्याओं के समाधान की दिशा में रचनात्मक भूमिका निभाने के बजाय उन्हें आंदोलन और टकराव की राह पर धकेलने की कोशिश की गई।
इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच एजेंसियां करेंगी, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न जरूर खड़ा किया है कि क्या प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े कुछ नेटवर्क केवल शिक्षा और मार्गदर्शन तक सीमित हैं, या फिर वे छात्रों की भावनाओं और असंतोष को अपने हितों के अनुरूप दिशा देने का प्रयास भी कर रहे हैं।
जाहिर है, उत्तर प्रदेश में चल रही कार्रवाई का उद्देश्य किसी कोचिंग संस्थान या शैक्षणिक गतिविधि को निशाना बनाना नहीं है। फोकस तो उन अवैध नेटवर्कों, सॉल्वर गैंगों और भर्ती माफियाओं पर है, जिन्होंने वर्षों तक व्यवस्थागत कमियों का फायदा उठाकर प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया।
तस्वीर श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय, पलवल के डीन (स्किल फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ एंड रिसर्च) प्रो संजय सिन्हा की है। उन्होंने यह लेख लिखा है।
संगठित अपराध का रूप ले चुका है पेपर लीक
पेपर लीक अब किसी एक कर्मचारी की गलती या किसी एक परीक्षा केंद्र की चूक का मामला नहीं रह गया है। पिछले वर्षों में सामने आए मामलों ने स्पष्ट किया है कि यह कई स्थानों पर संगठित अपराध का स्वरूप ग्रहण कर चुका था।
यूपी टीईटी, यूपी बोर्ड अंग्रेजी परीक्षा, आरओ-एआरओ और यूपी पुलिस भर्ती जैसे मामलों की जांच में बार-बार सॉल्वर गैंग, दलालों और कोचिंग नेटवर्कों की भूमिका सामने आती रही। कई मामलों में चयन की गारंटी देने वाले गिरोह, डमी अभ्यर्थियों को बैठाने वाले नेटवर्क और प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने वाले संगठित समूह भी पकड़े गए।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन मामलों में केवल अपराधी ही नहीं बदलते, बल्कि अपराध के तौर-तरीके भी लगातार अधिक परिष्कृत होते गए। यही कारण है कि पेपर लीक को अब सामान्य आपराधिक घटना नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और प्रतिभा आधारित चयन प्रणाली पर सीधा हमला माना जाने लगा है।
कोचिंग संस्थानों की भूमिका पर गंभीर बहस की आवश्यकता
कोचिंग संस्थानों की भूमिका को लेकर संतुलित लेकिन गंभीर चर्चा आवश्यक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रदेश के अधिकांश कोचिंग संस्थान ईमानदारी से लाखों छात्रों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
लेकिन जब बड़े भर्ती विवाद या परीक्षा संबंधी संकट सामने आते हैं, तब कुछ संस्थानों और उनसे जुड़े नेटवर्कों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। प्रयागराज में हुई हालिया कार्रवाई को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यहां मुद्दा किसी एक संस्थान का नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का है जिसमें शिक्षा से जुड़े कुछ समूह केवल मार्गदर्शक संस्था न रहकर प्रभाव केंद्र या दबाव समूह की भूमिका निभाने लगते हैं।
यदि छात्रों के असंतोष का इस्तेमाल प्रभाव निर्माण या समानांतर नेटवर्क खड़ा करने के लिए किया जाता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई स्वाभाविक रूप से आवश्यक हो जाती है। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पूरे कोचिंग सेक्टर को संदेह के घेरे में न खड़ा किया जाए।
कार्रवाई तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। इस कड़ी में पिछले नौ वर्षों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत परीक्षा माफिया, सॉल्वर गैंग और संगठित नेटवर्कों के खिलाफ जिस प्रकार की कार्रवाई हुई है, उसने इस समस्या की जड़ों पर प्रहार करने की दिशा में महत्वपूर्ण परिणाम दिए हैं।
भर्ती व्यवस्था पर अविश्वास का वह दौर
उत्तर प्रदेश का इतिहास बताता है कि भर्ती प्रक्रियाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं हैं। विशेष रूप से वर्ष 2012 से 2017 के बीच का दौर भर्ती विवादों, चयन प्रक्रियाओं पर उठते सवालों, पेपर लीक और नकल माफिया के बढ़ते प्रभाव के लिए याद किया जाता है।
उस समय प्रतियोगी छात्रों के बीच यह धारणा लगातार मजबूत हो रही थी कि भर्ती व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता प्रभावित हो रही है। इसी अवधि में पीसीएस, आरओ-एआरओ, प्रवक्ता भर्ती समेत कई चयन प्रक्रियाओं को लेकर विवाद सामने आए। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग भी लगातार सवालों के घेरे में रहा। तत्कालीन अध्यक्ष अनिल यादव की नियुक्ति को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली।
वहीं, विभिन्न भर्तियों और नियुक्तियों को लेकर उठे विवाद इतने गंभीर थे कि बाद के वर्षों में अनेक चयन प्रक्रियाओं और हजारों नियुक्तियों की सीबीआई जांच तक की नौबत आ गई। इसी दौरान वर्ष 2015 में पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से पहले ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।
बाद में उसका वास्तविक प्रश्नपत्र से मिलान हुआ और प्रश्न सही पाए गए। विरोध प्रदर्शन हुए, जांच बैठी और अंततः परीक्षा निरस्त करनी पड़ी। यह केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं थी, बल्कि उस दौर के व्यापक संकट का प्रतीक थी, जब नकल माफिया, सॉल्वर गैंग और दलालों का प्रभाव लगातार चर्चा में रहता था।
परीक्षा केंद्रों की निष्पक्षता पर सवाल उठते थे और कार्रवाई अक्सर अंतिम कड़ी तक पहुंचने से पहले ही थम जाती थी। इसका परिणाम यह था कि मेहनती अभ्यर्थियों के बीच यह भावना गहराने लगी कि केवल प्रतिभा और परिश्रम ही सफलता की गारंटी नहीं रह गए हैं।
सुधारों की दिशा में उठाए गए कदम
वैसे, पिछले 9 वर्षों में योगी सरकार में स्थिति बदलने के लिए निर्णायक प्रयास हुए हैं। जांच एजेंसियों ने पेपर लीक मामलों में केवल परीक्षा निरस्त करने तक सीमित रहने के बजाय पूरे नेटवर्क और उसके संचालकों तक पहुंचने की रणनीति अपनाई है।
आरओ-एआरओ और पुलिस भर्ती जैसे मामलों में यूपी एसटीएफ ने व्यापक कार्रवाई करते हुए पूरे नेक्सस का भंडाफोड़ किया। इस दौरान लखनऊ में कोचिंग नेटवर्क की भूमिका की भी जांच हुई, मास्टरमाइंड तक पहुंच बनाई गई और सैकड़ों लोग कार्रवाई के दायरे में आए।
ऐसे में, प्रदेश में पेपरलीक को रोकने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम, 2024 लागू किया, जिसका उद्देश्य पेपर लीक, सॉल्वर गैंग और संगठित परीक्षा अपराधों पर कठोर नियंत्रण स्थापित करना है।
हालांकि किसी भी कानून की सफलता केवल उसके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन में होती है। इसलिए आवश्यक है कि कार्रवाई व्यक्ति, संस्था, राजनीतिक प्रभाव या आर्थिक शक्ति देखकर नहीं, बल्कि अपराध की प्रकृति देखकर की जाए।
जाहिर है योगी सरकार इस बात को सुनिश्चित करने में कोई कोताही नहीं बरत रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में परीक्षा प्रणाली से जुड़े अपराधों को केवल प्रशासनिक समस्या मानने के बजाय संगठित अपराध के रूप में देखने का दृष्टिकोण विकसित हुआ है।
यही कारण है कि अब कार्रवाई केवल निचले स्तर के आरोपियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे नेटवर्क और उसके संचालकों तक पहुंचने का प्रयास किया जाता है, जो पहले की तुलना में कहीं अधिक संस्थागत और व्यवस्थित दिखाई देता है।
असली लड़ाई किसके खिलाफ?
इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि छात्रों और युवाओं को किसी भी राजनीतिक, संस्थागत या आर्थिक संघर्ष का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। यहां असली लड़ाई उन नेटवर्कों के खिलाफ है जिन्होंने शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द एक समानांतर अवैध तंत्र खड़ा कर दिया।
यह लड़ाई उन गिरोहों के खिलाफ है जो प्रश्नपत्रों की दलाली, सॉल्वर गैंग, फर्जी अभ्यर्थियों और अन्य अवैध तरीकों के जरिए प्रतिभा और परिश्रम आधारित चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। साथ ही यह संघर्ष उन व्यवस्थागत कमियों के खिलाफ भी है, जिनका लाभ उठाकर पेपर लीक सिंडिकेट और भर्ती माफिया वर्षों तक फलते-फूलते रहे।
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में परीक्षा माफिया, पेपर लीक नेटवर्क और संगठित परीक्षा अपराधों के खिलाफ जिस प्रकार की कार्रवाई हुई है, उससे व्यवस्था में भरोसा बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार हुआ है।
इसका परिणाम यह है कि आज सफलता का रास्ता पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से प्रतिभा, परिश्रम और पारदर्शिता से होकर गुजरता दिखाई देता है। हालांकि इस व्यवस्था की शुचिता बनाए रखना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।
शिक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक पक्ष, विशेषकर कोचिंग संस्थानों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे छात्रों के भविष्य निर्माण को ही अपना मूल उद्देश्य बनाए रखें। उनका कार्य मार्गदर्शन और शैक्षणिक सहयोग देना है, न कि ऐसी किसी गतिविधि का हिस्सा बनना जो युवाओं के सपनों, उनकी मेहनत और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करे।
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