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बेटे की हत्या के दोषी सौतेले पिता की सजा बरकरार:हाईकोर्ट ने उम्रकैद के खिलाफ अपील खारिज कर दीप्रयागराज2 घंटे पहले
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने गोरखपुर के प्रदीप उर्फ अमन चौरसिया की आपराधिक अपील खारिज करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है।
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गोरखपुर के चिलुवाताल थाना क्षेत्र में 28 अक्टूबर 2015 को दो साल के मासूम अभिमन्यु की गला दबाकर हत्या कर दी गई थी। बच्चे की मां मुन्नी देवी ने पुलिस को बताया कि उसका दूसरा पति प्रदीप, अभिमन्यु से (जो उसके पहले पति से था) नफरत करता था और अक्सर उसे पीटता था। घटना के दिन मुन्नी देवी बर्तन धो रही थी, तभी बच्चे की चीख सुनकर वह कमरे में पहुंची और प्रदीप को बेटे को पीटते देखा। प्रदीप मौके से फरार हो गया और बाद में पता चला कि बच्चे की मौत हो चुकी थी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर चोट के निशान और हड्डी टूटी हुई पाई गई, जिससे दम घुटने से मौत की पुष्टि हुई। ट्रायल कोर्ट ने 27 मई 2022 को प्रदीप को आईपीसी धारा 302 के तहत दोषी करार देते हुए उम्रकैद और 20,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
कोर्ट में दलील काम न आई
बचाव पक्ष ने एफआईआर दर्ज करने में देरी, गवाहों के मुकर जाने और तहरीर दरोगा के कहने पर लिखे जाने जैसी दलीलें दीं। लेकिन कोर्ट ने पाया कि एफआईआर सिर्फ सवा घंटे में दर्ज हो गई थी, इसलिए देरी का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि पांच में से चार गवाह मुकर गए, लेकिन कोर्ट ने माना कि मां मुन्नी देवी घटना की इकलौती व चश्मदीद गवाह थी और उसकी गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है।
कोर्ट ने कहा कि एक मां अपने बेटे की हत्या के असली दोषी को बचाकर अपने ही पति को झूठा नहीं फंसाएगी, खासकर जब उसने उसके लिए अपना पहला पति तक छोड़ दिया हो। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि रिश्तेदार होना गवाह को ‘हितबद्ध नहीं बनाता।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई खामी न पाते हुए सजा के खिलाफ अपील खारिज कर दी। अभियुक्त 31 अक्टूबर 2015 से जेल में बंद है।
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