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प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत मिली राहत रद्द:हाईकोर्ट ने आयकर अधिनियम की धारा 292 ए का हवाला दिया, आदेश कैंसिलप्रयागराज1 घंटे पहले
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयकर अधिनियम की धारा 277 के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि आयकर अपराधों में प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का लाभ नहीं दिया जा सकता।
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मिर्जापुर के आयकर अधिकारी ने कमरुद्दीन अंसारी और अजीमुल्लाह अंसारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। ये दोनों भदोही स्थित फर्म मेसर्स मोहम्मद इब्राहिम अजीमुल्लाह के साझेदार थे। आरोप था कि वर्ष 1968-69 के आकलन वर्ष में, 26 अक्टूबर 1968 को दाखिल विवरणी में फर्म ने मेसर्स दामोदर दास एंड अदर्स से प्राप्त 1,15,470 रुपये की आय छिपाई थी।
जानिये सुनवाई में क्या हुआ
मामले की सुनवाई के दौरान अजीमुल्लाह अंसारी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद केवल कमरुद्दीन अंसारी के खिलाफ मुकदमा चलता रहा। आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि 50,810 रुपये की राशि हाईकोर्ट के आदेश से घटा दी गई थी, और शेष 61,460 रुपये पर उसने कर व जुर्माना जमा कर दिया था।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मिर्जापुर ने 28 अप्रैल 1982 को कमरुद्दीन अंसारी को धारा 277 के तहत दोषी करार दिया, लेकिन मामला पुराना होने, आरोपी के पिता की मृत्यु और अपराध स्वीकार करने के आधार पर उसे प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत रिहा कर दिया।
आयकर अधिकारी ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिषेक शुक्ला ने तर्क दिया कि आयकर अधिनियम की धारा 292ए स्पष्ट रूप से प्रावधान करती है कि इस अधिनियम के तहत दोषी पाए गए व्यक्ति पर धारा 360 सीआरपीसी या प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट लागू नहीं होगा, जब तक कि वह व्यक्ति 18 वर्ष से कम उम्र का न हो।
सुप्रीम कोर्ट केस का हवाला दिया
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम ममता सेठी और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स बनाम ओंकार नाथ मामलों का हवाला दिया गया, जिनमें इसी तरह के सिद्धांत स्थापित किए गए थे। प्रतिवादी की ओर से सूचना के बावजूद कोई पेश नहीं हुआ, इसलिए मामले की सुनवाई एकपक्षीय रूप से हुई।
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने पाया कि निचली अदालत ने धारा 292ए के स्पष्ट प्रतिबंध को नजरअंदाज किया था। इसलिए 28 अप्रैल 1982 का आदेश रद्द कर दिया गया और अपील स्वीकार कर ली गई। कोर्ट ने संबंधित अदालत को निर्देश दिया कि वह दोनों पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देते हुए केवल सजा के बिंदु पर नए सिरे से आदेश पारित करे।
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