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क्या PM मोदी को लखनऊ के एक्टर ने नजरअंदाज किया?:अनिल रस्तोगी की सफाई- मेरी उम्र की वजह से चूक हुई2 घंटे पहले
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वायरल वीडियो में पीएम मोदी एक्टर की ओर हाथ बढ़ाते हैं, लेकिन रस्तोगी हाथ मिलाए बिना आगे बढ़ जाते हैं।
लखनऊ के रहने वाले 82 साल के रिटायर्ड साइंटिस्ट और सीनियर एक्टर अनिल कुमार रस्तोगी को मंगलवार को पद्मश्री पुरस्कार मिला। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें सम्मानित किया।
अनिल कुमार रस्तोगी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है। जिसमें दावा किया गया कि पद्म पुरस्कार समारोह के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नजरअंदाज कर दिया। हालांकि, इस वीडियो को लेकर अनिल कुमार रस्तोगी ने सफाई देते हुए कहा कि उनकी उम्र की वजह से यह चूक हो गई।
VIDEO देखिए…
मोदी ने हाथ बढ़ाया, रस्तोगी आगे बढ़ गए
दरअसल, वीडियो में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से अनिल रस्तोगी सम्मान लेने के लिए मंच की ओर जाते दिखाई देते हैं। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी ओर हाथ बढ़ाते हैं, लेकिन रस्तोगी हैंडशेक किए बिना आगे बढ़ जाते हैं। इस वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आईं। कुछ यूजर्स ने इसे पीएम मोदी को इग्नोर करना बताया।
एक यूजर की पोस्ट।
वीडियो वायरल होने पर सफाई दी
वीडियो वायरल होने के बाद अनिल रस्तोगी ने खुद सोशल मीडिया पर सफाई दी। एक पोस्ट पर रिप्लाई करते हुए उन्होंने लिखा, “जो लोग मजाक बना रहे हैं, उनसे कहना चाहता हूं कि मेरी उम्र 80 साल से ज्यादा है। यह मेरी उम्र की वजह से हुई एक चूक थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है और मेरा मानना है कि देश का नेतृत्व करने के लिए वह सबसे बेहतर विकल्प हैं।”
अनिल रस्तोगी की पोस्ट।
कला और विज्ञान के क्षेत्र में अनिल रस्तोगी के योगदान के लिए उन्हें इस साल पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।
कौन हैं अनिल रस्तोगी?
डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी थिएटर और फिल्मों की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय किया है और वैज्ञानिक के रूप में भी काम किया है। वे सीएसआईआर के प्रतिष्ठित संस्थान सीडीआरआई, लखनऊ में बायोकेमेस्ट्री विभाग के प्रमुख (हेड) रह चुके हैं और एक वैज्ञानिक के रूप में भी लंबी सेवा दे चुके हैं।
अनिल रस्तोगी ने फिल्म ‘इश्कजादे’ में अर्जुन कपूर के दादा का किरदार निभाया था।
75 से ज्यादा फिल्मों में दिखे
फिल्मी करियर की बात करें तो अनिल कुमार रस्तोगी ‘इश्कजादे’, ‘मुल्क’, ‘रेड’ और ‘थप्पड़’ जैसी 75 से अधिक फिल्मों में एक्टिंग कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने 14 वेब सीरीज और विभिन्न टीवी धारावाहिकों के करीब 500 एपिसोड में काम किया है। वे 99 नाटकों के लगभग एक हजार मंचन कर चुके हैं।
अनिल रस्तोगी ने वेब सीरीज ‘आश्रम’ में मुख्यमंत्री (सुंदर लाल) की भूमिका निभाई थी।
कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पहले भी कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। डॉ. अनिल रस्तोगी को यश भारती-2017, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार-2023, पाटलिपुत्र लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड-2024, अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय शलाका सम्मान-2026 और कालिदास सम्मान मिल चुका है।
बचपन में बेगम साहिबा ने रखा था ‘फकीरे’ नाम, मां ने बेच दिया था
अनिल रस्तोगी एक इंटरव्यू में बताते हैं कि उनके परिवार में बच्चों के जीवित न रहने की मान्यता के चलते बचपन में उन्हें एक बेगम साहिबा को प्रतीकात्मक रूप से सौंप दिया गया था। उन्होंने उनका नाम ‘फकीरे’ रखा, जबकि उनके बड़े भाई का नाम ‘गुलाम हुसैन’ रखा गया। मोहर्रम के दौरान घर में ताजिया रखा जाता था और वह ताबीज पहनकर फकीरी की रस्म निभाते हुए लोगों के घर जाते थे। बेगम साहिबा उन्हें खाने-पीने की चीजें दिया करती थीं।
अक्षय कुमार से कहा- ‘मैं भी कभी जवान था’ अपने मशहूर हास्य नाटक ‘पंछी जा, पंछी आ’ को याद करते हुए अनिल रस्तोगी कहते हैं कि यह उनके जीवन के बेहतरीन नाटकों में से एक था। इसी नाटक पर बाद में फिल्म ‘गरम मसाला’ बनी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में अक्षय कुमार से कहा था, “आज जो किरदार आप निभा रहे हैं, वह मैं बरसों पहले मंच पर कर चुका हूं।” जब अक्षय कुमार हैरान हुए तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “मैं भी कभी जवान था।”
एक लाइन ने बदल दी फिल्मी किस्मत फिल्म ‘इश्कजादे’ के ऑडिशन का किस्सा सुनाते हुए रस्तोगी बताते हैं कि उन्हें एक संवाद समझ नहीं आ रहा था। उन्होंने साथी कलाकार अशोक सिन्हा से मदद मांगी, जिन्होंने उन्हें वह लाइन समझाई, जबकि वे खुद भी उसी रोल के दावेदार थे। दिलचस्प बात यह रही कि अशोक सिन्हा का चयन नहीं हुआ, लेकिन अनिल रस्तोगी को वही भूमिका मिल गई। उनका मानना है कि शायद उसी संवाद ने उनके फिल्मी करियर की दिशा बदल दी।
अनिल रस्तोगी थिएटर भी करते हैं। वे 82 साल के हैं।
पद्मश्री से ज्यादा लोगों का प्यार मिला पद्मश्री सम्मान की घोषणा को लेकर अनिल रस्तोगी कहते हैं कि सम्मान मिलने की खुशी तो थी ही, लेकिन उससे भी बड़ी खुशी इस बात की हुई कि उन्हें देशभर से लोगों का इतना स्नेह मिला। घोषणा के बाद लगातार फोन और संदेश आते रहे, जिससे उन्हें एहसास हुआ कि लोग उनसे कितना प्यार करते हैं।
लखनऊ जाएं या मुंबई, बिरयानी की फरमाइश तय लखनऊ से अपने जुड़ाव पर वह कहते हैं कि जब भी मुंबई या किसी दूसरे शहर जाते हैं, दोस्त सबसे पहले लखनऊ की बिरयानी मंगवाने की फरमाइश करते हैं। हालांकि वह खुद नॉनवेज और लहसुन नहीं खाते, लेकिन दोस्तों की यह मांग कभी खत्म नहीं होती। वह बताते हैं कि उनके परिवार का चिकनकारी से भी जुड़ाव रहा है, इसलिए उनके घर का नाम ‘चिकन महल’ रखा गया।
साइंस और थिएटर दोनों को साथ रखा अनिल रस्तोगी कहते हैं कि एक समय उन्हें सलाह दी गई कि साइंस और थिएटर में से किसी एक को चुन लें। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि वह विज्ञान के प्रति अपनी जिम्मेदारी कभी नहीं छोड़ेंगे। वह दिनभर अपनी वैज्ञानिक जिम्मेदारियां निभाते और बाकी लोग जब परिवार के साथ समय बिताते, तब वह थिएटर के लिए समय निकालते। उनके मुताबिक, थिएटर को दिया गया वही अतिरिक्त समय आज उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।
‘लखनऊ की तवायफें भी तहजीब सिखाती थीं’ लखनऊ की संस्कृति पर बात करते हुए अनिल रस्तोगी कहते हैं कि यह शहर हमेशा तहजीब, नजाकत, नफासत और खानपान के लिए जाना जाता रहा है। उनका कहना है कि पुराने दौर में यहां की तवायफें भी इतनी शिष्ट और सुसंस्कृत होती थीं कि बड़े घरानों के बच्चों को व्यवहार और अदब सीखने के लिए उनके पास भेजा जाता था। उनके मुताबिक, वह दौर अलग था और आज लखनऊ भी तेजी से बदल रहा है।
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