कैंसर के मरीजों का जीवन लंबा करने वाली गोली
पैंक्रियाटिक या अग्न्याशय के कैंसर के मरीजों का जीवन लंबा करने में एक प्रायोगिक दवा ने सफलता पाई है.
Deutsche Welle|
Jun 01, 2026 09:10 PM IST
पैंक्रियाटिक या अग्न्याशय के कैंसर के मरीजों का जीवन लंबा करने में एक प्रायोगिक दवा ने सफलता पाई है. अमेरिका के रिसर्चरों ने बताया कि इसके गंभीर साइड इफेक्ट्स भी कम हैं.इस दवा का नाम है डैरेक्सोनरासिब. यह कैंसर का विकास करने वाले म्यूटेटेड प्रोटीन को ब्लॉक कर देता है. पैंक्रियाटिक कैंसर (अग्न्याशय या पाचन ग्रंथी का कैंसर) के 90 फीसदी मामलों में यह कारगर साबित हुआ. पिछले कई दशकों से इस दिशा में प्रयास चल रहे थे लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के डॉ जेव वाइनबर्ग का कहना है, “भले ही यह कैंसर को खत्म नहीं करेगी लेकिन यह आगे बढ़ने की दिशा में एक बड़ा कदम है.” डॉ वाइनबर्ग इस रिसर्च से जुड़े हुए हैं.
साइड इफेक्ट्स कम, उम्र बढ़ी
रिसर्च के दौरान इस दवा या ज्यादा कीमोथेरेपी के इस्तेमाल का 500 मरीजों पर परीक्षण किया गया. इन मरीजों में कैंसर या तो मेटास्टैटिक अवस्था में थे या फिर उन पर पिछली दवाइयों का असर होना बंद हो गया था. मेटास्टैटिक वह अवस्था है जिसमें ट्यूमर प्राथमिक चरण से दूसरे या आगे की चरणों में बढ़ते हैं. रोजाना इस गोली के उपयोग से जीवन लगभग दोगुना हो गया इसके साथ ही मरीजों के स्वास्थ्य पर गंभीर साइड इफेक्ट्स भी कम हैं. इस दवा के इस्तेमाल से गंभीर फुंसियां और मुंह में घाव जैसे साइड इफ्केट देखे गए हैं.
रिसर्चरों की खोज की रिपोर्ट ‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में प्रकाशित हुई है और 31 मई को इसे अमेरिकन सोसाइटी फॉर क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी (एएससीओ) की शिकागो में हुई बैठक में पेश किया गया. जिन लोगों को डैरेक्सनरासिब की गोलियां दी गईं वे औसतन 13.2 महीने तक जीवित रहे जबकि कीमोथेरेपी वाले मरीज औसतन 6.7 महीने तक ही जीवित रह सके. भले ही यह अवधि बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन वाइनबर्ग का कहना है कि पहली बार किसी दवा ने कीमोथेरेपी के मुकाबले अहम फायदा दिखाया है.
यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना कैंसर सेंटर की डॉ रचना श्रॉफ इस रिसर्च में शामिल नहीं हैं लेकिन एससीओ की बैठक में शामिल होने के बाद उन्होंने कहा, “16 वर्षों से पैंक्रियाटिक कैंसर का इलाज करते रहने के बाद, वास्तव में मैं रो पड़ी” जब मैंने पहली बार रिसर्च के नतीजे देखे. इस इलाज के दौरान “कैंसर के मरीज इस पर टिके रहे क्योंकि इससे उन्हें स्थाई और महत्वपूर्ण फायदा हुआ” यह देख कर डॉ श्रॉफ बहुत प्रभावित हुईं.
इलाज के दौरान ट्यूमर सिकुड़ा
गोलियों का असर धीरे धीरे कम होकर आखिर में खत्म हो जाता है लेकिन मरीजों ने इसे कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों की तुलना में काफी ज्यादा समय तक इस्तेमाल किया. इसमें उन्हें दर्द भी कम हुआ और उनका जीवन भी बेहतर था क्योंकि ट्यूमर सिकुड़ गया था. बहुत से लोग आंकड़ों का विश्लेषण होने के बाद भी यह दवा ले रहे थे. वाइनबर्ग के मुताबिक इसका मतलब है कि जिंदा रहने की तुलनात्मक अवधि और ज्यादा हो सकती है, क्योंकि रिसर्चर उन पर लगातार नजर रख रहे हैं.
डाना फार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट के डॉ ब्रायन वोल्फिन ने इस रिसर्च रिपोर्ट को पेश किया. उनका कहना है कि मेटास्टैटिक पैंक्रियाटिक कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों के लिए “इलाज का नया मानक” यह दवा हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि रिसर्चर इस बीमारी में इसे पहले इस्तेमाल करने पर भी खोज करेंगे. ट्यूमर का सिकुड़ना ज्यादा मरीजों में सर्जरी को भी संभव कर सकता है.
इस दवा पर रिसर्च के लिए धनराशि मेकर रेवॉल्यूशन मेडिसिन्स ने दिया है. अमेरिका का फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) इस दवा की समीक्षा को जल्दी आगे बढ़ाने की योजना बना रहा है. इस बीच एजेंसी ने कुछ शर्तें पूरी करने वाले मरीजों को प्रायोगिक दवा देने की मंजूरी दे दी है.
कीमोथेरेपी का विकल्प
पैंक्रियाटिक कैंसर सबसे घातक कैंसर में से एक है क्योंकि दूसरे अंगों तक फैलने के बाद ही इसकी पहचान हो पाती है. अमेरिकन कैंसर सोसायटी के आकलन के मुताबिक इस साल अमेरिका में 67,000 लोगों में पैंक्रियाटिक कैंसर के मामले सामने आ सकते हैं जबकि इस बीमारी की वजह से मरने वालों की संख्या करीब 52,000 तक रह सकती है. बीते पांच साल में कुल मिला कर बीमारी की चपेट में आने के बाद जीवित रहने की दर केवल 13 फीसदी है.
दूसरे तरह के कैंसर के इलाज में कई प्रकार के कीमोथेरेपी विकल्पों से काफी फायदा हुआ है लेकिन पैंक्रियाटिक कैंसर से निपटना ज्यादा मुश्किल है. कई कैंसर विशेषज्ञों का कहना है कि इस नई रिसर्च ने नए विकल्पों की उम्मीद जगाई है. दर्जनों नई दवाओं के विकास के लिए रिसर्च अभी भी जारी हैं.



