मुस्लिम धर्मगुरु बोले-100 साल पुरानी मस्जिद के लिए हाईकोर्ट जाएंगे:क्या मस्जिद, मदरसे या मजार ही अवैध; सहारनपुर में 16 घंटे में ढहाई गई मस्जिद

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ग्राउंड रिपोर्टमुस्लिम धर्मगुरु बोले-100 साल पुरानी मस्जिद के लिए हाईकोर्ट जाएंगे:क्या मस्जिद, मदरसे या मजार ही अवैध; सहारनपुर में 16 घंटे में ढहाई गई मस्जिदसहारनपुर6 मिनट पहलेलेखक: अमित गुप्ता

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सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को करीब 16 घंटे चले बुलडोजर के बाद पूरी तरह ढहा कर मलबा भी हटा दिया गया। शनिवार तड़के 4 बजे शुरू हुई कार्रवाई रात करीब 9 बजे तक चली। प्रशासन का कहना था कि मस्जिद सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से बनी थी। इसे पूरी क

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वहीं, मुस्लिम धर्मगुरुओं और मस्जिद पक्ष ने कार्रवाई पर सवाल उठाए। उनका दावा है कि मस्जिद करीब 100 साल पुरानी थी और कलेक्ट्रेट भवन से पहले से वहां मौजूद थी। उनका कहना है कि मस्जिद और कलेक्ट्रेट का खसरा नंबर एक ही है। ऐसे में सिर्फ मस्जिद को अवैध निर्माण कैसे माना गया? मुस्लिम पक्ष ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों का हवाला देते हुए प्रशासन के दावे पर सवाल खड़े किए।

उनका सबसे बड़ा सवाल कार्रवाई की टाइमिंग और कानूनी प्रक्रिया को लेकर है। उनका कहना है कि नगर मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ऊपर की अदालत में जाने के लिए पर्याप्त मौका नहीं दिया गया। आनन-फानन रात में 6 बुलडोजर मंगा लिए और गिराकर मलबा हटा लिया। उनका सवाल है कि जब मामला अदालत में चुनौती देने योग्य था, तो हाईकोर्ट जाने का मौका क्यों नहीं दिया गया? अब मुस्लिम पक्ष इस मामले को हाईकोर्ट ले जाने की बात कह रहा है। पढ़िए इस पूरी कार्रवाई पर रिपोर्ट…

कलेक्ट्रेट के आसपास के एरिया को सील कर दिनभर में 6 बुलडोजर ने मस्जिद को ध्वस्त कर दिया।कलेक्ट्रेट के आसपास के एरिया को सील कर दिनभर में 6 बुलडोजर ने मस्जिद को ध्वस्त कर दिया।

मस्जिद पक्ष का दावा- 1911 या उससे पहले से बनी थी

मुस्लिम धर्मगुरुओं और मस्जिद कमेटी का दावा है कि मस्जिद करीब 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है। उनका कहना है कि यह कलेक्ट्रेट की मौजूदा इमारत से पहले से वहां मौजूद थी।

मस्जिद पक्ष की ओर से 1 जनवरी, 1911 का बिजली बिल भी पुराने रिकॉर्ड के तौर पर पेश किए जाने की बात कही गई। इसके अलावा मस्जिद को करीब 70 साल से सुन्नी वक्फ बोर्ड में दर्ज बताया गया है।

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी मस्जिद के 1911 से पहले का होने का दावा किया। उनका कहना है कि मस्जिद की मलकियत पुराने रिकॉर्ड में वहीद खान और याकूब खान के नाम बताई जाती है।

सरकारी वकील बोले- मस्जिद सरकारी जमीन पर बनी थी

1911 के बिजली बिल पर सवाल, प्रशासन बोला- तब सप्लाई ही नहीं थी

मस्जिद पक्ष के पुराने बिजली बिल के दावे पर प्रशासन ने सवाल उठाए हैं। प्रशासन की ओर से तर्क दिया गया कि सहारनपुर में बिजली की आपूर्ति करीब साल-1922 के आसपास शुरू हुई थी। ऐसे में 1911 के बिजली बिल की प्रामाणिकता पर सवाल खड़ा होता है। हालांकि, मस्जिद पक्ष का कहना है कि यह बिल सरकारी वेबसाइट से निकाला गया है। इसे पुराने रिकॉर्ड के रूप में अदालत के सामने रखा गया था।

मस्जिद पक्ष ने जमीन के खसरा नंबर को लेकर भी सवाल उठाया है। मौलाना कारी इसहाक गोरा का दावा है कि मस्जिद और पूरा कलेक्ट्रेट परिसर एक ही खसरा नंबर में दर्ज है। मस्जिद पक्ष का सवाल है कि जब दोनों एक ही खसरा नंबर में दर्ज हैं, तो केवल मस्जिद को अवैध निर्माण कैसे माना गया। उनका कहना है कि इस पहलू की भी जांच होनी चाहिए थी।

मुस्लिम पक्ष का दावा- 1926 के राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्ट्रेट कब्जेदार है

मस्जिद की ओर से पैरवी कर रहे वकील बाबर वसीम के मुताबिक, मस्जिद पक्ष ने साल-1926 फसली का खेवट रिकॉर्ड कोर्ट में पेश किया था। इसमें याकूब खान को जमीन का मालिक और कलेक्ट्रेट को कब्जेदार के रूप में दर्ज बताया गया है।

वकील के मुताबिक, उस समय कुल जमीन करीब 24 बीघा थी। इसमें वर्तमान कलेक्ट्रेट परिसर का हिस्सा भी शामिल था। करीब 8 बीघा जमीन में कलेक्ट्रेट की इमारत और परिसर बताया गया, जबकि बाकी करीब 16 बीघा में कोठयार्ड और मस्जिद का क्षेत्र बताया गया। मस्जिद पक्ष का दावा है कि इस रिकॉर्ड में कलेक्ट्रेट को मालिक नहीं, बल्कि कब्जेदार बताया गया था।

मस्जिद पक्ष ने वक्फ संपत्ति से जुड़ी रसीद रिकॉर्ड के तौर पर कोर्ट में पेश की थी।मस्जिद पक्ष ने वक्फ संपत्ति से जुड़ी रसीद रिकॉर्ड के तौर पर कोर्ट में पेश की थी।

किराए की रसीद और 1995 का एग्रीमेंट भी सामने रखा

  • वकील बाबर वसीम के अनुसार, कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद डाकघर की ओर से मस्जिद के लिए किराया दिए जाने का रिकॉर्ड भी रहा है। उनका कहना है कि पहले डाकघर की ओर से 500 रुपए प्रतिमाह किराया दिया जाता था।
  • वर्ष 1995 में एग्रीमेंट के बाद यह किराया बढ़ाकर 1,500 रुपए प्रतिमाह किया गया। हालांकि 1995 से पहले दिए गए किराए की रसीदें रिकॉर्ड में पेश नहीं की गई थीं। मस्जिद पक्ष का तर्क है कि यदि निर्माण पूरी तरह अवैध था तो इतने लंबे समय तक किराए और अन्य सरकारी रिकॉर्ड का अस्तित्व भी जांच का विषय होना चाहिए था।
  • मस्जिद पक्ष का कहना है कि वर्ष 1962 में नगरपालिका के गठन के बाद से मस्जिद पर नगरपालिका टैक्स लगाया जाता रहा और उसका भुगतान भी किया गया। नगरपालिका से जुड़े दस्तावेज भी अदालत के सामने रखे गए थे, लेकिन मस्जिद पक्ष का आरोप है कि इन्हें साक्ष्य के तौर पर रिकॉर्ड पर स्वीकार नहीं किया गया।
  • मस्जिद पक्ष का एक और महत्वपूर्ण दावा वक्फ रिकॉर्ड को लेकर है। वकील बाबर वसीम के अनुसार, मस्जिद की संपत्ति वर्ष 1955 से वक्फ बोर्ड में दर्ज है और उसे बाकायदा वक्फ नंबर भी मिला हुआ है।
  • मस्जिद के मुतव्वली तनवीर की ओर से मामले में शपथ पत्र दिए जाने की बात कही गई है। इसके अलावा पांच अन्य गवाहों ने भी अपने-अपने शपथ पत्र दिए थे। वकील बाबर वसीम का आरोप है कि इन गवाहों की विधिवत गवाही नहीं कराई गई।

शनिवार तड़के 4 बजे से 6 बुलडोजर ने मस्जिद तोड़ना शुरू किया। रात 9 बजे तक गिराकर मलबा भी उठा लिया।शनिवार तड़के 4 बजे से 6 बुलडोजर ने मस्जिद तोड़ना शुरू किया। रात 9 बजे तक गिराकर मलबा भी उठा लिया।

10 फरवरी, 2025 को बजरंग दल के पदाधिकारी की शिकायत से विवाद

कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद 3300 स्क्वायर फीट में बनी हुई थी। दो मंजिला मस्जिद में 2 बड़े हॉल समेत 5 कमरे थे। ग्राउंड फ्लोर पर एक बड़ा हॉल और दो कमरे थे। पहली मंजिल पर हॉल के साथ एक बड़ा कमरा था। कमरे में डाकघर चलता था।

10 फरवरी 2025 को बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने मस्जिद को अवैध बताते हुए डीएम से शिकायत की थी। मस्जिद परिसर के कमरों और डाकघर से किराया वसूले जाने का आरोप लगाया गया। इसके बाद डीएम ने मजिस्ट्रेट को जांच के आदेश दिए। जांच में मस्जिद अवैध पाई गई।

शनिवार शाम करीब 4 बजे मस्जिद को ढहा दिया गया, इसके बाद मलबे को हटाने का काम शुरू हुआ।शनिवार शाम करीब 4 बजे मस्जिद को ढहा दिया गया, इसके बाद मलबे को हटाने का काम शुरू हुआ।

16 जुलाई 2026 को नगर मजिस्ट्रेट ने अवैध माना

24 मार्च, 2025 को प्रशासन ने नगर मजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर की। 16 जुलाई, 2026 को कोर्ट ने मस्जिद को अवैध माना और उसे हटाने के साथ 6.41 करोड़ रुपए की हर्जाना वसूलने का आदेश दिया। कब्जेदारों को 30 दिन का समय दिया।

20 जुलाई को मस्जिद पक्ष ने मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ जिला कोर्ट में याचिका दाखिल की। 24 जुलाई को जिला कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के फैसले पर स्टे देते हुए सुनवाई आगे बढ़ाई। 2 सितंबर को जिला जज सतेंद्र कुमार की कोर्ट ने सिटी मजिस्ट्रेट के ध्वस्तीकरण के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी। मामले को लेकर इलाके में चर्चाएं और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं। प्रशासन ने किसी तरह के विरोध या कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया।

रात में घेराबंदी, नेताओं को हाउस अरेस्ट किया, तड़के 6 बुलडोजर चले

4 सितंबर की रात करीब 11 बजे कलेक्ट्रेट परिसर में सुरक्षा बढ़ा दी गई। मस्जिद के आसपास भी करीब 300 पुलिस, पीएसी के जवान तैनात किए गए। इसके बाद शनिवार, 5 सितंबर की तड़के करीब 4 बजे से ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई। मौके पर करीब 6 बुलडोजर लगाए गए।

करीब 16 घंटे की प्रक्रिया के बाद पूरी मस्जिद ढहाकर मलबा बाहर फेंक दिया गया। इस कार्रवाई में करीब 200 जवानों को लगाया गया। बॉर्डर तक भी सील किए गए। जिससे कोई बाहर से विपक्ष का नेता ना आ सके। वहीं, विपक्ष के लोकल नेताओं को रात को ही हाउस अरेस्ट कर लिया गया।

शुक्रवार रात में कैराना से सहारनपुर आ रहीं इकरा हसन को पुलिस ने हाउस अरेस्ट कर लिया।शुक्रवार रात में कैराना से सहारनपुर आ रहीं इकरा हसन को पुलिस ने हाउस अरेस्ट कर लिया।

मुस्लिम पक्ष अब हाईकोर्ट जाएगा

कलेक्ट्रेट की मस्जिद अब जमींदोज हो चुकी है, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ है। मस्जिद पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता बाबर वसीम ने बताया कि इस संबंध में मस्जिद पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में रिट दाखिल की जाएगी। निचली अदालत के सामने पेश किए गए दस्तावेजों और सबूतों को रिकॉर्ड पर लिए जाने की अपील की जाएगी। मामले में विधि सम्मत कार्रवाई की मांग की जाएगी।

मौलाना कारी इसहाक गोरा बोले- क्या केवल मस्जिद, मदरसे या मजार ही अवैध होते हैं?

मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा- बहुत ही निंदनीय कार्रवाई है।मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा- बहुत ही निंदनीय कार्रवाई है।

सवाल: जो मस्जिद गिराई गई है, इसको लेकर आप क्या कहना चाहते हैं?

जवाब: सिटी मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने इसे अवैध घोषित किया। किस आधार पर किया, क्या सबूत कमेटी ने रखे थे, ये नहीं मालूम। यह यकीनन न केवल सहारनपुर, बल्कि पूरे देश के लिए एक गम का दिन है। करीब 100 साल पुरानी मस्जिद को अवैध बताकर गिराने के पीछे सियासी पहलू भी हो सकता है। कोर्ट से अपनी बात रखने का समय मिलना चाहिए था, लेकिन कानूनी प्रक्रिया का पर्याप्त समय नहीं दिया गया। इतनी जल्दी बुलडोजर कार्रवाई कर दी गई। सवाल ये उठता है कि क्या केवल मस्जिद, मदरसे या मजार ही अवैध होते हैं? क्या मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है?

सवाल: मस्जिद का खसरा नंबर और पूरे कलेक्ट्रेट का खसरा भी एक बताया जा रहा, तो क्या कलेक्ट्रेट भी अवैध है?

जवाब: देखिए, ये बात सब जान रहे हैं कि पूरे कलेक्ट्रेट क्षेत्र का खसरा नंबर एक ही है। जानकारियों के मुताबिक, कलेक्ट्रेट बाद में बना था और मस्जिद पहले से वहां मौजूद थी। इसके बावजूद ऊपर की अदालतों में अपील करने का समय नहीं दिया गया। तत्काल बुलडोजर कार्रवाई कर दी गई। इससे सियासतदानों को राजनीति करने का मौका मिल गया है, जो कि बेहद अफसोसजनक है।

सवाल: क्या आपको ऐसा लग रहा कि किसी तरह से टारगेट किया जा रहा?

जवाब: कुछ सियासतदां ऐसे हैं जो एक समुदाय पर कार्रवाई करके या एक समुदाय के धार्मिक स्थलों पर किसी तरह से निशाना बनाकर, कुछ कट्टरपंथी लोगों को खुश करने का काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह उनकी गलत सोच है। लोग अब समझदार हो चुके हैं, तो अब इन चीजों से बाहर निकलना चाहिए। हम हर धर्म के लोगों का सम्मान करते हैं।

सवाल: अब आगे आप लोग क्या करेंगे, क्या कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे?

जवाब: क्या सरकार को पूरे प्रदेश और देश में सिर्फ मस्जिद, मदरसे और मजार ही अवैध नजर आ रहे हैं? यह कैसा इंसाफ है? एक बड़ा सवाल है, इसका जवाब कौन देगा? बहरहाल, हमने अभी तमाम लोगों से यही अपील की है कि संयम से काम लें, जज्बात से कोई काम न लें। कानून के हिसाब से अपना कदम उठाएं और इस पर जो पैनल काम कर रहा था, वो कौन से कोर्ट जाता है।

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