रतजगा में रातभर घुली जलेबा की मिठास:काशी में गूंजती रही कजरी की तान,दुकानदार बोले-बदलते समय के साथ सिमट रही रतजगा की पुरानी परंपरा

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रतजगा में रातभर घुली जलेबा की मिठास:दुकानदार बोले-बदलते समय के साथ सिमट रही पुरानी परंपरा,सपा नेता ने भी छाना जलेबावाराणसी19 मिनट पहले

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काशी में भादो महीने के पहले त्योहार रतजगा की रात जलेबा की मिठास और कजरी की तान से माहौल रसपूर्ण रहा। शहर से लेकर गांव तक लोगों ने रातभर जागकर रतजगा की परंपरा निभाई। देर शाम से ही जलेबा खाने-खिलाने का दौर शुरू हो गया। शहर के प्रमुख इलाकों और मोहल्लों

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रतजगा को लेकर बाजारों में भी खास रौनक देखने को मिली। परिवारों ने अपनी जरूरत के अनुसार जलेबा की खरीदारी की। अलग-अलग दुकानों पर जलेबा 140 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रति किलो तक बिका। दुकानदारों के मुताबिक रतजगा के मौके पर जलेबा की मांग सामान्य दिनों की तुलना में काफी बढ़ जाती है। पूरे जिले में इस बार 35 करोड़ रुपये से अधिक के जलेबा कारोबार का अनुमान लगाया गया है। रात बढ़ने के साथ दुकानों पर खरीदारों की आवाजाही भी बनी रही।

दुकानों पर रातभर छना जलेबा।दुकानों पर रातभर छना जलेबा।

जलेबा के साथ कजरी की परंपरा

रतजगा केवल जलेबा खाने की परंपरा नहीं है, बल्कि काशी की लोक संस्कृति में इसका संबंध कजरी गायन से भी रहा है। पुराने समय में रतजगा की रात मोहल्लों में महिलाएं और लोक कलाकार एकत्र होते थे। देर रात तक कजरी की तान सुनाई देती थी। महिलाएं समूह में कजरी गाती थीं और लोग जागरण करते हुए जलेबा खाते-खिलाते थे। हालांकि समय के साथ रतजगा के पारंपरिक स्वरूप में बदलाव आया है।

सपा नेता ने जलेबा छाना।सपा नेता ने जलेबा छाना।

अस्सी निवासी पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि रतजगा की परंपरा अब मुख्य रूप से निभाई जा रही है। समय के साथ सामाजिक जीवन और मनोरंजन के तौर-तरीके बदले हैं। पहले रतजगा के अवसर पर मोहल्लों में कजरी की तान रातभर सुनाई देती थी, लेकिन अब ऐसा माहौल कम ही देखने को मिलता है। उनके अनुसार, परंपरा का स्वरूप बदल गया है और कई जगह यह केवल रस्म अदायगी तक सीमित रह गई है।

काशी में यह परम्परा वर्षों से निभाई जा रही।काशी में यह परम्परा वर्षों से निभाई जा रही।

1818 में रामनगर से शुरू हुआ था कजरी मेला

काशी में कजरी की परंपरा का इतिहास काफी पुराना और समृद्ध रहा है। रामनगर में वर्ष 1818 में कजरी मेले की शुरुआत हुई थी। इसके बाद शिवाला में 14 दिनों तक कजरी का मेला आयोजित किया जाता था। इस मेले में काशी नरेश भी शामिल होते थे। कजरी दंगल में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने वाले विजेता को काशी नरेश की ओर से पांच रुपये का पुरस्कार दिया जाता था।

शिवाला के महंत भी कजरी दंगल के विजेता को तीन रुपये का इनाम देते थे। उस दौर में कजरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थी, बल्कि यह लोकजीवन, सामाजिक मेलजोल और ग्रामीण संस्कृति का अहम हिस्सा थी।

मनोज यादव ने कहा - अब रतजगा खाने और खिलाने तक सीमित हो गई है।मनोज यादव ने कहा – अब रतजगा खाने और खिलाने तक सीमित हो गई है।

भारतेंदु युग में कजरी का स्वर्णकाल

साहित्य और लोक संस्कृति के क्षेत्र में भारतेंदु हरिश्चंद्र के काल को कजरी का स्वर्णकाल माना जाता है। काशी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कजरी दंगलों की विशेष लोकप्रियता थी। अलग-अलग गांवों और क्षेत्रों से कलाकार आते थे और अपनी गायकी से लोगों का मनोरंजन करते थे।

समय के साथ सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में बदलाव आया। गांवों से जमींदारी व्यवस्था समाप्त होने के बाद कजरी के पारंपरिक दंगलों का आयोजन भी धीरे-धीरे बंद हो गया। इसके साथ ही रतजगा की सामूहिक परंपरा भी कमजोर पड़ती गई।

लोग एक दूसरे को खिलाते दिखे जलेबा।लोग एक दूसरे को खिलाते दिखे जलेबा।

अब जानिए ज्योतिषाचार्य ने क्या बताया

बीएचयू के ज्योतिष विभाग के प्रो. विनय कुमार पांडेय ने बताया कि भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजली तृतीया, सातुड़ी तीज या सतवा तीज भी कहते है। इस वर्ष भाद्रपद कृष्ण तृतीया तिथि रविवार 30 अगस्त को प्रातः 8:50 से शुरू होकर 31 अगस्त सोमवार को प्रातः 8:28 तक है इसलिए रविवार को रतजगा कर सोमवार को कजरी तीज मनाई जाएगी।‌सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, और समृद्धि के लिए तथा अविवाहित कन्याएं मनचाहा वर प्राप्त करने के लिए व्रत रखती है।

मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी तथा तृतीया तिथि को भगवान शिव ने उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें स्वीकार किया था। इस पर्व पर महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं और रात्रि में चंद्रमा के उदय होने पर रोली, अक्षत, दूध और जल से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य देने के बाद ही महिलाएं सत्तू खाकर अपना व्रत खोलती हैं। कजरी तीज की पूर्व संध्या पर महिलाएं सायं काल जलेबा (बड़ी- बड़ी जलेबी) खाकर कजरी गीत गाकर रातभर जागती है और अगले दिन व्रत रखतीं हैं।

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