आसान नहीं है योगी होना:कानून व्यवस्था से राम मंदिर तक, योगी के 8 साल की सबसे बड़ी चुनौतियां और फैसले

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आसान नहीं है योगी होना:कानून व्यवस्था से राम मंदिर तक, योगी के 8 साल की सबसे बड़ी चुनौतियां और फैसले9 मिनट पहले

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अमिताभ अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskarअमिताभ अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार

गीता में कहा गया है-‘योगः कर्मसु कौशलम’। अर्थात योग केवल ध्यान तप और संन्यास का नाम नहीं है। कर्म को उत्कृष्टता, समर्पण, संतुलन और निष्काम भाव से करना ही सच्चा योग है। यही जीवन को सफल तथा सार्थक बनाने का मार्ग भी है।

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वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री कहते हैं- योगी होना केवल पद संभालना नहीं, बल्कि निरंतर परीक्षा, अपेक्षाओं और वैचारिक प्रतिबद्धता के बीच स्वयं को सिद्ध करते रहना है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता में वैसे भी योगी की कल्पना निष्क्रिय वैराग्य की नहीं रही। यहां योगी वह है, जो अपने संकल्प को सिद्ध करे।

इस दृष्टि से योगी आदित्यनाथ को परखें तो मुख्यमंत्री पद पर आसीन एक ऐसा संन्यासी दिखाई देता है जो अग्नि में तपकर भी शीतल है, तूफान में भी स्थिर है और किसी भी उथल-पुथल में अडिग है। कोई भी साधक यदि राजनीति में आता है तो उससे जनमानस की अपेक्षाएं दोहरी होती हैं- साधु और शासक की भी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इसी अग्निपरीक्षा से गुजरते हुए उत्तर प्रदेश के विकास का अध्याय लिख रहे हैं।

इस अध्याय को पढ़ना और समझना आसान नहीं, क्योंकि एक तो यह अनवरत लिखा जा रहा है, दूसरे यह सनातन के प्रति पूर्ण समर्पण का है। यह आसान नहीं है, क्योंकि योगी होना भी आसान नहीं है।

गोरक्षपीठ का दर्शन रक्त में उतारा

उत्तराखंड के एक साधारण परिवार में जन्म लेना और फिर गोरक्षपीठ की परंपरा से जुड़ना शायद संयोग नहीं, अजय सिंह बिष्ट नामक युवक का आंतरिक आह्वान था, जिसे गुरु ने जब योगी आदित्यनाथ का नाम दिया तो उसने पीठ के जीवनदर्शन को अपने रक्त में उतार लिया।

गृहस्थ जीवन की समस्त सुविधाओं को त्यागकर वैराग्य का मार्ग चुनना, फिर तपस्वी जीवन के भीतर से राजनीति की तरफ मुड़ना, यह संभवतः प्रारब्ध ने पहले ही तय कर रखा था। मात्र 26 वर्ष की आयु में संसद में पहुंचना, वह भी गोरखपुर जैसे क्षेत्र से, जहां की माटी पूर्वांचल के पूरे दर्द को समेटे हुए थी।

यह कोई राजनीतिक कुल की विरासत नहीं थी, बल्कि लोगों के साथ स्पंदनशील रिश्ते का प्रमाण था, जिसने योगी को पांच बार चुनकर संसद में भेजा। इस दौरान लोगों ने सदन में एक युवा को पूर्वांचल के असाध्य रोग इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम समेत वहां की गरीबी को लेकर दहाड़ते देखा।

संकल्प पथ पर बढ़ते गए योगी

लेकिन नियति ने योगी के लिए एक और परीक्षा सोच रखी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर 2017 में भाजपा उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ जीती और जब योगी आदित्यनाथ के नाम की घोषणा मुख्यमंत्री के रूप में हुई, तो एक क्षण के लिए पूरा देश चकित भी था और स्तब्ध भी।

इस स्तब्धता में एक गहरा सवाल था कि क्या एक भगवाधारी संत उस राज्य को संभाल पाएगा, जो दशकों से अपराध, जातिवाद और अराजकता के दलदल में धंसा हुआ था। योगी अब अपनी सबसे कठिन परीक्षा के लिए अपने संकल्प पथ की ओर बढ़ने के लिए तैयार थे।

पहला मोर्चा था कानून व्यवस्था का। जहां माफिया के आगे थाने थरथराते थे, जहां अपराधी कानून से नहीं, कानून अपराधियों से डरता था, उस उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित करना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, एक नैतिक युद्ध था।

योगी ने वह युद्ध लड़ा और बिना किसी भय के, बिना किसी पक्षपात के। माफिया नेटवर्क पर शिकंजा, अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर, और वह नाम जो कभी राजनीतिक संरक्षण की छाया में अजेय थे, कानून के कठघरे में खड़े हुए तो लोगों ने योगी में एक सख्त प्रशासक की छवि के साथ अपने आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना भी देखी।

‘बुलडोजर नीति’ पर प्रश्न उठे, लेकिन यह भी एक अकाट्य सत्य है कि उत्तर प्रदेश में एक ऐसी इच्छाशक्ति का संचार हुआ, जो पहले कभी नहीं थी।

प्रकृति की निर्मम परीक्षा में खरे

प्रकृति यदि स्वयं विद्रोह पर उतर आए तो ऐसा समय शासन की सबसे निर्मम परीक्षा का होता है। कोरोना महामारी केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं था, वह एक सभ्यतागत भूकंप था। प्रवासी मजदूर करुण जनसैलाब के बीच महानगरों की चमक छोड़कर अपने गांवों की ओर लौट रहे थे।

उत्तर प्रदेश जैसे घनी आबादी वाले राज्य में इस संकट का आघात और भी गहरा था। ऐसे समय में सबसे बड़ी कसौटी जनविश्वास के निर्माण की होती है।

टीकाकरण की गति, व्यवस्था की बहाली और उस अथाह मानवीय पीड़ा के बीच प्रशासन का टिके रहना, यह नेतृत्व की वह परीक्षा थी जिसने उत्तर प्रदेश को पूरे देश में सबसे अलग खड़ा किया। दूसरी लहर की त्रासदी और गंभीर थी, लेकिन योगी सरकार इसके लिए स्वास्थ्य संरचना के साथ पहले से तैयार थी।

विश्वसनीय नेता की छवि

भारतीय राजनीति में ऐसे नेताओं की कमी नहीं, जो हर विषय पर सुविधाजनक अस्पष्टता ओढ़ लेते हैं। योगी उस परंपरा से नहीं आते। सनातन पर, हिंदुत्व पर, भारत की सांस्कृतिक पहचान पर उनका रुख कभी धुंधला नहीं रहा। यह स्पष्टता उन्हें समर्थकों की दृष्टि में एक विश्वसनीय नेता बनाती है।

पीएम मोदी के मार्गदर्शन में एक्सप्रेस-वे और हवाई अड्डों के साथ-साथ अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी में विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, मथुरा में सांस्कृतिक उत्थान का विमर्श, यह सब उस भारत की आत्मा को पुनः जागृत करने का प्रयास है, जो अपनी पहचान को पुनः परिभाषित करना चाहती है। विकास और संस्कृति को एक साथ साधना, यह वह समन्वय है जो यूपी मॉडल को विशिष्टता देता है।

सच्चे अर्थों में योगी

2022 का चुनाव-परिणाम इतिहास के पन्नों पर उस स्याही से लिखा गया, जो सहज नहीं मिटती। स्वतंत्र भारत में उत्तर प्रदेश में पहली बार कोई सरकार लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। यह करोड़ों मतदाताओं का मौन किंतु दृढ़ संदेश था कि परिवर्तन केवल वादों में नहीं, अनुभव में भी महसूस हुआ है।

इस जनादेश ने योगी सरकार की कार्यशैली व नीतियों पर मुहर लगाई। मुख्यमंत्री योगी उस विचारधारा का प्रमाणित चेहरा बने, जो सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आधुनिक विकास को एक-दूसरे का पूरक मानती है।

एक योगी यदि मुख्यमंत्री भी हो तो उसके सामने अदृश्य चुनौतियां भी कम नहीं होतीं। बड़ी चुनौती तो अपने भीतर के योगी को जीवित रखने की है। साधु का धर्म है अपेक्षाओं से मुक्त रहना और मुख्यमंत्री का धर्म है करोड़ों अपेक्षाओं का बोझ वहन करना।

साधु एकाकी साधना में जीता है

साधु की दुनिया में वैचारिक शुद्धता सर्वोपरि होती है, राजनीति की दुनिया में समझौते व संतुलन की अनंत परतें होती हैं। साधु एकाकी साधना में जीता है, शासक को हर क्षण जनसमुद्र के बीच खड़े रहना होता है।

इन दोनों ध्रुवों के बीच, वैराग्य और सत्ता के बीच, आस्था और प्रशासन के बीच, संन्यास और संसार के बीच समन्वय बनाना ऐसी तपस्या है, जो कोई विरला ही बना सकता है और इसीलिए ‘योगी’ होना आसान नहीं है। योगी को समझने के लिए केवल नीतियों और उपलब्धियों की सूची पर्याप्त नहीं।

उस मनुष्य को भी देखें जो प्रत्येक दिन साधु और शासक की दोहरी भूमिका में स्वयं को सिद्ध करने का प्रयास करता है। और, जो इस कठिनाई को जानते हुए भी इस पथ पर चलता रहे, वही सच्चे अर्थों में योगी है।

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